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circa 605–538 BC
The Babylonian Exile
Jerusalem falls and the temple burns; Ezekiel and Daniel minister among the exiles as Lamentations mourns the city's ruin.
इस काल के वचन
- विलापगीत ३:३२लगभग ५८८ ई.पू.
यद्यपि वह पीड़ा के कारण तो हो जाते हैं, किंतु करुणा का सागर भी तो वही हैं, क्योंकि अथाह होता है उनका करुणा-प्रेम.
- विलापगीत ३:३३लगभग ५८८ ई.पू.
पीड़ा देना उनका सुख नहीं होता न ही मनुष्यों को यातना देना उनका आनंद होता है.
- विलापगीत ३:३४लगभग ५८८ ई.पू.
पृथ्वी के समस्त बंदियों का दमन,
- विलापगीत ३:३५लगभग ५८८ ई.पू.
परम प्रधान की उपस्थिति में न्याय-वंचना,
- विलापगीत ३:३६लगभग ५८८ ई.पू.
किसी की न्याय-दोहाई में की गई विकृति में याहवेह का समर्थन कदापि नहीं होता?
- विलापगीत ३:३७लगभग ५८८ ई.पू.
यदि स्वयं प्रभु ने कोई घोषणा न की हो, तो किसमें यह सामर्थ्य है, कि जो कुछ उसने कहा है, वह पूरा होगा?
- विलापगीत ३:३८लगभग ५८८ ई.पू.
क्या यह तथ्य नहीं कि अनुकूल अथवा प्रतिकूल, जो कुछ घटित होता है, वह परम प्रधान के बोलने के द्वारा ही होता है?
- विलापगीत ३:३९लगभग ५८८ ई.पू.
भला कोई जीवित मनुष्य अपने पापों के दंड के लिए परिवाद कैसे कर सकता है?
- विलापगीत ३:४०लगभग ५८८ ई.पू.
आइए हम अपनी नीतियों का परीक्षण करें तथा अपने याहवेह की ओर लौट चलें:
- विलापगीत ३:४१लगभग ५८८ ई.पू.
आइए हम अपने हृदय एवं अपनी बांहें परमेश्वर की ओर उन्मुख करें तथा अपने हाथ स्वर्गिक परमेश्वर की ओर उठाएं:
- विलापगीत ३:४२लगभग ५८८ ई.पू.
“हमने अपराध किए हैं, हम विद्रोही हैं, आपने हमें क्षमा प्रदान नहीं की है.
- विलापगीत ३:४३लगभग ५८८ ई.पू.
“आपने स्वयं को कोप में भरकर हमारा पीछा किया; निर्दयतापूर्वक हत्यायें की हैं.
- विलापगीत ३:४४लगभग ५८८ ई.पू.
आपने स्वयं को एक मेघ में लपेट रखा है, कि कोई भी प्रार्थना इससे होकर आप तक न पहुंच सके.
- विलापगीत ३:४५लगभग ५८८ ई.पू.
आपने हमें राष्ट्रों के मध्य कीट तथा कूड़ा बना छोड़ा है.
- विलापगीत ३:४६लगभग ५८८ ई.पू.
“हमारे सभी शत्रु बेझिझक हमारे विरुद्ध निंदा के शब्द उच्चार रहे हैं.
- विलापगीत ३:४७लगभग ५८८ ई.पू.
आतंक, जोखिम, विनाश तथा विध्वंस हम पर आ पड़े हैं.”
- विलापगीत ३:४८लगभग ५८८ ई.पू.
मेरी प्रजा के इस विनाश के कारण मेरे नेत्रों के अश्रुप्रवाह नदी सदृश हो गए हैं.
- विलापगीत ३:४९लगभग ५८८ ई.पू.
बिना किसी विश्रान्ति मेरा अश्रुपात होता रहेगा,
- विलापगीत ३:५०लगभग ५८८ ई.पू.
जब तक स्वर्ग से याहवेह इस ओर दृष्टिपात न करेंगे.
- विलापगीत ३:५१लगभग ५८८ ई.पू.
अपनी नगरी की समस्त पुत्रियों की नियति ने मेरे नेत्रों को पीड़ित कर रखा है.
- विलापगीत ३:५२लगभग ५८८ ई.पू.
उन्होंने, जो अकारण ही मेरे शत्रु हो गए थे, पक्षी सदृश मेरा अहेर किया है.
- विलापगीत ३:५३लगभग ५८८ ई.पू.
उन्होंने तो मुझे गड्ढे में झोंक मुझ पर पत्थर लुढ़का दिए हैं;
- विलापगीत ३:५४लगभग ५८८ ई.पू.
जब जल सतह मेरे सिर तक पहुंचने लगी, मैं विचार करने लगा, अब मैं मिट जाऊंगा.
- विलापगीत ३:५५लगभग ५८८ ई.पू.
गड्ढे से मैंने, याहवेह आपकी दोहाई दी.
- विलापगीत ३:५६लगभग ५८८ ई.पू.
आपने मेरी इस दोहाई सुन ली है: “मेरी विमुक्ति के लिए की गई मेरी पुकार की ओर से, अपने कान बंद न कीजिए.”