मुख्य सामग्री पर जाएँ

circa 605–538 BC

The Babylonian Exile

Jerusalem falls and the temple burns; Ezekiel and Daniel minister among the exiles as Lamentations mourns the city's ruin.

1,784 वचन · 3 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. विलापगीत ३:३२लगभग ५८८ ई.पू.

    यद्यपि वह पीड़ा के कारण तो हो जाते हैं, किंतु करुणा का सागर भी तो वही हैं, क्योंकि अथाह होता है उनका करुणा-प्रेम.

  2. विलापगीत ३:३३लगभग ५८८ ई.पू.

    पीड़ा देना उनका सुख नहीं होता न ही मनुष्यों को यातना देना उनका आनंद होता है.

  3. विलापगीत ३:३४लगभग ५८८ ई.पू.

    पृथ्वी के समस्त बंदियों का दमन,

  4. विलापगीत ३:३५लगभग ५८८ ई.पू.

    परम प्रधान की उपस्थिति में न्याय-वंचना,

  5. विलापगीत ३:३६लगभग ५८८ ई.पू.

    किसी की न्याय-दोहाई में की गई विकृति में याहवेह का समर्थन कदापि नहीं होता?

  6. विलापगीत ३:३७लगभग ५८८ ई.पू.

    यदि स्वयं प्रभु ने कोई घोषणा न की हो, तो किसमें यह सामर्थ्य है, कि जो कुछ उसने कहा है, वह पूरा होगा?

  7. विलापगीत ३:३८लगभग ५८८ ई.पू.

    क्या यह तथ्य नहीं कि अनुकूल अथवा प्रतिकूल, जो कुछ घटित होता है, वह परम प्रधान के बोलने के द्वारा ही होता है?

  8. विलापगीत ३:३९लगभग ५८८ ई.पू.

    भला कोई जीवित मनुष्य अपने पापों के दंड के लिए परिवाद कैसे कर सकता है?

  9. विलापगीत ३:४०लगभग ५८८ ई.पू.

    आइए हम अपनी नीतियों का परीक्षण करें तथा अपने याहवेह की ओर लौट चलें:

  10. विलापगीत ३:४१लगभग ५८८ ई.पू.

    आइए हम अपने हृदय एवं अपनी बांहें परमेश्वर की ओर उन्मुख करें तथा अपने हाथ स्वर्गिक परमेश्वर की ओर उठाएं:

  11. विलापगीत ३:४२लगभग ५८८ ई.पू.

    “हमने अपराध किए हैं, हम विद्रोही हैं, आपने हमें क्षमा प्रदान नहीं की है.

  12. विलापगीत ३:४३लगभग ५८८ ई.पू.

    “आपने स्वयं को कोप में भरकर हमारा पीछा किया; निर्दयतापूर्वक हत्यायें की हैं.

  13. विलापगीत ३:४४लगभग ५८८ ई.पू.

    आपने स्वयं को एक मेघ में लपेट रखा है, कि कोई भी प्रार्थना इससे होकर आप तक न पहुंच सके.

  14. विलापगीत ३:४५लगभग ५८८ ई.पू.

    आपने हमें राष्ट्रों के मध्य कीट तथा कूड़ा बना छोड़ा है.

  15. विलापगीत ३:४६लगभग ५८८ ई.पू.

    “हमारे सभी शत्रु बेझिझक हमारे विरुद्ध निंदा के शब्द उच्चार रहे हैं.

  16. विलापगीत ३:४७लगभग ५८८ ई.पू.

    आतंक, जोखिम, विनाश तथा विध्वंस हम पर आ पड़े हैं.”

  17. विलापगीत ३:४८लगभग ५८८ ई.पू.

    मेरी प्रजा के इस विनाश के कारण मेरे नेत्रों के अश्रुप्रवाह नदी सदृश हो गए हैं.

  18. विलापगीत ३:४९लगभग ५८८ ई.पू.

    बिना किसी विश्रान्ति मेरा अश्रुपात होता रहेगा,

  19. विलापगीत ३:५०लगभग ५८८ ई.पू.

    जब तक स्वर्ग से याहवेह इस ओर दृष्टिपात न करेंगे.

  20. विलापगीत ३:५१लगभग ५८८ ई.पू.

    अपनी नगरी की समस्त पुत्रियों की नियति ने मेरे नेत्रों को पीड़ित कर रखा है.

  21. विलापगीत ३:५२लगभग ५८८ ई.पू.

    उन्होंने, जो अकारण ही मेरे शत्रु हो गए थे, पक्षी सदृश मेरा अहेर किया है.

  22. विलापगीत ३:५३लगभग ५८८ ई.पू.

    उन्होंने तो मुझे गड्ढे में झोंक मुझ पर पत्थर लुढ़का दिए हैं;

  23. विलापगीत ३:५४लगभग ५८८ ई.पू.

    जब जल सतह मेरे सिर तक पहुंचने लगी, मैं विचार करने लगा, अब मैं मिट जाऊंगा.

  24. विलापगीत ३:५५लगभग ५८८ ई.पू.

    गड्ढे से मैंने, याहवेह आपकी दोहाई दी.

  25. विलापगीत ३:५६लगभग ५८८ ई.पू.

    आपने मेरी इस दोहाई सुन ली है: “मेरी विमुक्ति के लिए की गई मेरी पुकार की ओर से, अपने कान बंद न कीजिए.”