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circa AD 48–96

Letters to the Churches

Paul and other apostles write to strengthen, correct, and encourage the scattered churches across the Roman world.

2,767 वचन · 21 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. 1 कोरिंथ ११:३१लगभग ५९ ई.

    यदि हम अपने विवेक को सही रीति से जांच लें तो हमारी ताड़ना नहीं की जाएगी

  2. 1 कोरिंथ ११:३२लगभग ५९ ई.

    ताड़ना के द्वारा प्रभु हमें अनुशासित करते हैं कि हम संसार के लिए निर्धारित दंड के भागी न हों.

  3. 1 कोरिंथ ११:३३लगभग ५९ ई.

    इसलिये प्रिय भाई बहनो, जब तुम भोजन के लिए इकट्ठा होते हो तो एक दूसरे के लिए ठहरे रहो.

  4. 1 कोरिंथ ११:३४लगभग ५९ ई.

    जो व्यक्ति अपनी भूख को नियंत्रित न रख सके, वह अपने घर पर ही खाए कि तुम्हारा इकट्ठा होना तुम्हारे दंड का कारण न बने. शेष विषयों का समाधान मैं वहां आने पर स्वयं करूंगा.

  5. 1 कोरिंथ १२:१लगभग ५९ ई.

    अब पवित्र आत्मा द्वारा दी गई क्षमताओं से संबंधित बातों के विषय में: मैं नहीं चाहता, प्रिय भाई बहनो, कि तुम इनसे अनजान रहो.

  6. 1 कोरिंथ १२:२लगभग ५९ ई.

    तुम्हें याद होगा कि मसीह में अविश्वासी स्थिति में तुम गूंगी मूर्तियों के पीछे चलने के लिए भटका दिए गए थे.

  7. 1 कोरिंथ १२:३लगभग ५९ ई.

    इसलिये मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि परमेश्वर के आत्मा से प्रेरित कोई भी व्यक्ति यह कह ही नहीं सकता “शापित हो येशु” और न ही कोई पवित्र आत्मा की प्रेरणा के बिना कह सकता है “येशु प्रभु हैं.”

  8. 1 कोरिंथ १२:४लगभग ५९ ई.

    आत्मा द्वारा दी गई क्षमताएं अलग-अलग हैं किंतु आत्मा एक ही हैं.

  9. 1 कोरिंथ १२:५लगभग ५९ ई.

    सेवकाई भी अलग-अलग हैं किंतु प्रभु एक ही हैं.

  10. 1 कोरिंथ १२:६लगभग ५९ ई.

    काम करने के तरीके भी अनेक हैं किंतु परमेश्वर एक ही हैं, जो सब मनुष्यों में उनका प्रभाव उत्पन्‍न करते हैं.

  11. 1 कोरिंथ १२:७लगभग ५९ ई.

    प्रत्येक को पवित्र आत्मा का प्रकाशन सबके बराबर लाभ के उद्देश्य से दिया जाता है.

  12. 1 कोरिंथ १२:८लगभग ५९ ई.

    आत्मा द्वारा किसी को ज्ञान भरी सलाह की क्षमता और किसी को उन्हीं आत्मा द्वारा ज्ञान भरी शिक्षा की क्षमता प्रदान की जाती है;

  13. 1 कोरिंथ १२:९लगभग ५९ ई.

    किसी को उन्हीं आत्मा द्वारा विश्वास की तथा किसी को उन्हीं आत्मा द्वारा चंगा करने की क्षमता प्रदान की जाती है;

  14. 1 कोरिंथ १२:१०लगभग ५९ ई.

    किसी को सामर्थ्य के काम करने की, किसी को भविष्यवाणी की. किसी को आत्माओं की पहचान की, किसी को अन्य भाषाओं की तथा किसी को भाषाओं के वर्णन की क्षमता.

  15. 1 कोरिंथ १२:११लगभग ५९ ई.

    इन सबको सिर्फ एक और एक ही आत्मा के द्वारा किया जाता है तथा वह हर एक में ये क्षमताएं व्यक्तिगत रूप से बांट देते हैं.

  16. 1 कोरिंथ १२:१२लगभग ५९ ई.

    जिस प्रकार शरीर एक है और उसके अंग अनेक, शरीर के अंग अनेक होने पर भी शरीर एक ही है; इसी प्रकार मसीह भी हैं.

  17. 1 कोरिंथ १२:१३लगभग ५९ ई.

    यहूदी हो या यूनानी, दास हो या स्वतंत्र, एक ही शरीर होने के लिए एक ही आत्मा में हमारा बपतिस्मा किया गया तथा हम सभी को एक ही आत्मा पिलाया गया.

  18. 1 कोरिंथ १२:१४लगभग ५९ ई.

    शरीर सिर्फ एक अंग नहीं परंतु अनेक अंग है.

  19. 1 कोरिंथ १२:१५लगभग ५९ ई.

    यदि पैर कहे, “मैं हाथ नहीं इसलिये मैं शरीर का अंग नहीं.” तो क्या उसके ऐसा कहने से वह शरीर का अंग नहीं रह जाता?

  20. 1 कोरिंथ १२:१६लगभग ५९ ई.

    और यदि कान कहे, “मैं आंख नहीं इसलिये मैं शरीर का अंग नहीं.” तो क्या उसके ऐसा कहने से वह शरीर का अंग नहीं रह जाता?

  21. 1 कोरिंथ १२:१७लगभग ५९ ई.

    यदि सारा शरीर आंख ही होता तो सुनना कैसे होता? यदि सारा शरीर कान ही होता तो सूंघना कैसे होता?

  22. 1 कोरिंथ १२:१८लगभग ५९ ई.

    किंतु परमेश्वर ने अपनी अच्छी बुद्धि के अनुसार हर एक अंग को शरीर में नियुक्त किया है.

  23. 1 कोरिंथ १२:१९लगभग ५९ ई.

    यदि सभी अंग एक ही अंग होते तो शरीर कहां होता?

  24. 1 कोरिंथ १२:२०लगभग ५९ ई.

    इसलिये वास्तविकता यह है कि अंग अनेक किंतु शरीर एक ही है.

  25. 1 कोरिंथ १२:२१लगभग ५९ ई.

    आंख हाथ से नहीं कह सकती, “मुझे तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं,” या हाथ-पैर से, “मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं.”