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circa 1900–1700 BC
Jacob, Joseph & Egypt
Jacob wrestles with God and becomes Israel; Joseph is sold into slavery yet rises to save the world from famine.
इस काल के वचन
- उत्पत्ति ४०:२१लगभग १७१७ ई.पू.
प्रधान पिलाने वाले को फिर से उसकी जवाबदारी दे दी गई; वह फ़रोह के हाथ में फिर से प्याला देने लगे.
- उत्पत्ति ४०:२२लगभग १७१७ ई.पू.
लेकिन प्रधान पकाने वाले को फांसी पर लटका दिया; सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा योसेफ़ ने बताया था.
- उत्पत्ति ४०:२३लगभग १७१७ ई.पू.
यह सब देखकर भी प्रधान पिलाने वाले ने योसेफ़ को याद न किया; पर भूल गया.
- उत्पत्ति ४१:१लगभग १७१५ ई.पू.
पूरे दो साल बाद फ़रोह ने एक स्वप्न देखा: वे नील नदी के किनारे खड़े हैं.
- उत्पत्ति ४१:२लगभग १७१५ ई.पू.
नदी में से सात सुंदर एवं मोटी गायें निकली और घास चरने लगीं.
- उत्पत्ति ४१:३लगभग १७१५ ई.पू.
फिर और सात गायें नील नदी में से निकलीं, जो कुरूप तथा पतली थीं. ये नदी के किनारे उन मोटी गायों के पास आकर खड़ी हो गईं.
- उत्पत्ति ४१:४लगभग १७१५ ई.पू.
और कुरूप एवं दुर्बल गायों ने उन सुंदर एवं मोटी गायों को खा लिया. इससे फ़रोह की नींद खुल गई.
- उत्पत्ति ४१:५लगभग १७१५ ई.पू.
जब उन्हें फिर नींद आई, तब उन्होंने एक और स्वप्न देखा: एक ही तने में से सात बालें उगीं, जो अच्छी और मोटी मोटी थीं.
- उत्पत्ति ४१:६लगभग १७१५ ई.पू.
फिर सात और बालें उगीं जो पतली और मुरझाई हुई थीं,
- उत्पत्ति ४१:७लगभग १७१५ ई.पू.
तब पतली बालों ने मोटी बालों को निगल लिया. इससे फ़रोह की नींद खुल गई और वह समझ गये कि यह स्वप्न था.
- उत्पत्ति ४१:८लगभग १७१५ ई.पू.
सुबह होने पर राजा मन में बेचैन हुए, इसलिये इनका अर्थ जानने के लिए मिस्र देश के सब ज्योतिषियों एवं पंडितों को बुलवाया और फ़रोह ने उन्हें अपने दोनों स्वप्न बताये लेकिन कोई भी उनका अर्थ नहीं बता पाया.
- उत्पत्ति ४१:९लगभग १७१५ ई.पू.
तब प्रधान पिलाने वाले ने फ़रोह से कहा, “आज मुझे अपनी गलती याद आ रही है.
- उत्पत्ति ४१:१०लगभग १७१५ ई.पू.
एक बार फ़रोह अपने नौकरों से क्रुद्ध हुए और मुझे और प्रधान खानसामे को अंगरक्षकों के नायक के घर के बंदीगृह में डाला.
- उत्पत्ति ४१:११लगभग १७१५ ई.पू.
हमने उस कारावास में स्वप्न देखा, और दोनों ही स्वप्न का अपना अलग अर्थ था.
- उत्पत्ति ४१:१२लगभग १७१५ ई.पू.
एक इब्री युवक वहां था, वह अंगरक्षकों के नायक का सेवक था. जब हमने उसे अपना स्वप्न बताया उसने हमारे हर एक के स्वप्न की व्याख्या की.
- उत्पत्ति ४१:१३लगभग १७१५ ई.पू.
जैसा उसने बताया था वैसा ही हुआ: फ़रोह ने मुझे तो अपना पद सौंप दिया, और खानसामें को प्राण-दंड दे दिया.”
- उत्पत्ति ४१:१४लगभग १७१५ ई.पू.
यह सुनकर फ़रोह ने कहा कि योसेफ़ को मेरे पास लाओ. उन्होंने जल्दी योसेफ़ को कारागार से बाहर निकाला. और उसके बाल कटाकर उसके कपड़े बदलकर फ़रोह के पास लेकर आये.
- उत्पत्ति ४१:१५लगभग १७१५ ई.पू.
फ़रोह ने योसेफ़ से कहा, “मैंने एक स्वप्न देखा है, उसका अर्थ कोई नहीं बता पा रहे हैं, लेकिन मैंने तुम्हारे बारे में सुना है कि तुम स्वप्न का अर्थ बता सकते हो.”
- उत्पत्ति ४१:१६लगभग १७१५ ई.पू.
योसेफ़ ने यह सुनकर फ़रोह से कहा, “अर्थ मैं नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर ही देंगे.”
- उत्पत्ति ४१:१७लगभग १७१५ ई.पू.
तब फ़रोह ने कहा, “मैंने स्वप्न में देखा कि मैं नील नदी के किनारे खड़ा हूं.
- उत्पत्ति ४१:१८लगभग १७१५ ई.पू.
वहां मैंने सात मोटी एवं सुंदर गायों को नील नदी से निकलते देखा. और वे घास चर रही थीं.
- उत्पत्ति ४१:१९लगभग १७१५ ई.पू.
तभी मैंने देखा कि सात और गायें निकलीं—जो दुबली, पतली और कुरूप थीं. ऐसी कुरूप गायें मैंने मिस्र देश में कभी नहीं देखीं.
- उत्पत्ति ४१:२०लगभग १७१५ ई.पू.
दुर्बल एवं कुरूप गायों ने उन सात मोटी एवं सुंदर गायों को खा लिया.
- उत्पत्ति ४१:२१लगभग १७१५ ई.पू.
इतना होने पर भी यह समझ नहीं पाये कि इन्होंने उन सात मोटी गायों को कैसे खा लिया; लेकिन वे अब भी वैसी ही कुरूप बनी हुई थीं. और मेरी नींद खुल गई.
- उत्पत्ति ४१:२२लगभग १७१५ ई.पू.
“मैंने एक और स्वप्न देखा: एक ही तने में से सात मोटी एवं अच्छी बालें उगीं.