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circa 6 BC – AD 30

The Life of Jesus

The eternal Son of God enters history: born in Bethlehem, baptized in the Jordan, crucified at Golgotha, raised on the third day.

3,779 वचन · 4 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. मत्तियाह ४:११लगभग २६ ई.

    तब शैतान उन्हें छोड़कर चला गया और स्वर्गदूत आए और उनकी सेवा करने लगे.

  2. मत्तियाह ४:१२लगभग २६ ई.

    यह मालूम होने पर कि बपतिस्मा देनेवाले योहन को बंदी बना लिया गया है, येशु गलील प्रदेश में चले गए,

  3. मत्तियाह ४:१३लगभग २६ ई.

    और नाज़रेथ नगर को छोड़ कफ़रनहूम नगर में बस गए, जो झील तट पर ज़ेबुलून तथा नफताली नामक क्षेत्र में था.

  4. मत्तियाह ४:१४लगभग २६ ई.

    ऐसा इसलिये हुआ कि भविष्यवक्ता यशायाह की यह भविष्यवाणी पूरी हो:

  5. मत्तियाह ४:१५लगभग २६ ई.

    यरदन नदी के पार समुद्रतट पर बसे ज़ेबुलून तथा नफताली प्रदेश अर्थात् गलील प्रदेश में, जहां गैर-इस्राएली बसे हुए हैं,

  6. मत्तियाह ४:१६लगभग २६ ई.

    अंधकार में जी रहे लोगों ने एक बड़ी ज्योति को देखा; गहन अंधकार के निवासियों पर ज्योति चमकी.

  7. मत्तियाह ४:१७लगभग २६ ई.

    उस समय से येशु ने यह उपदेश देना प्रारंभ कर दिया, “मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग-राज्य पास आ गया है.”

  8. मत्तियाह ४:१८लगभग २६ ई.

    एक दिन गलील झील के किनारे चलते हुए येशु ने दो भाइयों को देखा: शिमओन, जो पेतरॉस कहलाए तथा उनके भाई आन्द्रेयास को. ये समुद्र में जाल डाल रहे थे क्योंकि वे मछुआरे थे.

  9. मत्तियाह ४:१९लगभग २६ ई.

    येशु ने उनसे कहा, “मेरा अनुसरण करो—मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुआरे बनाऊंगा.”

  10. मत्तियाह ४:२०लगभग २६ ई.

    वे उसी क्षण अपने जाल छोड़कर येशु का अनुसरण करने लगे.

  11. मत्तियाह ४:२१लगभग २६ ई.

    जब वे वहां से आगे बढ़े तो येशु ने दो अन्य भाइयों को देखा—ज़ेबेदियॉस के पुत्र याकोब तथा उनके भाई योहन को. वे दोनों अपने पिता के साथ नाव में अपने जाल ठीक कर रहे थे. येशु ने उन्हें बुलाया.

  12. मत्तियाह ४:२२लगभग २६ ई.

    उसी क्षण वे नाव और अपने पिता को छोड़ येशु के पीछे हो लिए.

  13. मत्तियाह ४:२३लगभग २६ ई.

    येशु सारे गलील प्रदेश की यात्रा करते हुए, उनके यहूदी सभागृहों में शिक्षा देते हुए, स्वर्ग-राज्य के ईश्वरीय सुसमाचार का उपदेश देने लगे. वह लोगों के हर एक रोग तथा हर एक व्याधि को दूर करते जा रहे थे.

  14. मत्तियाह ४:२४लगभग २६ ई.

    सारे सीरिया प्रदेश में उनके विषय में समाचार फैलता चला गया और लोग उनके पास उन सबको लाने लगे, जो रोगी थे तथा उन्हें भी, जो विविध रोगों, पीड़ाओं, दुष्टात्मा, मूर्च्छा रोगों तथा पक्षाघात से पीड़ित थे. येशु इन सभी को स्वस्थ करते जा रहे थे.

  15. मत्तियाह ४:२५लगभग २६ ई.

    गलील प्रदेश, देकापोलिस, येरूशलेम, यहूदिया प्रदेश और यरदन नदी के पार से बड़ी भीड़ उनके पीछे-पीछे चली जा रही थी.

  16. मत्तियाह ५:१लगभग ३१ ई.

    इकट्ठा हो रही भीड़ को देख येशु पर्वत पर चले गए और जब वह बैठ गए तो उनके शिष्य उनके पास आए.

  17. मत्तियाह ५:२लगभग ३१ ई.

    येशु ने उन्हें शिक्षा देना प्रारंभ किया. उन्होंने कहा,

  18. मत्तियाह ५:३लगभग ३१ ई.

    “धन्य हैं वे, जो दीन आत्मा के हैं, क्योंकि स्वर्ग-राज्य उन्हीं का है.

  19. मत्तियाह ५:४लगभग ३१ ई.

    धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं. क्योंकि उन्हें शांति दी जाएगी.

  20. मत्तियाह ५:५लगभग ३१ ई.

    धन्य हैं वे, जो नम्र हैं क्योंकि पृथ्वी उन्हीं की होगी.

  21. मत्तियाह ५:६लगभग ३१ ई.

    धन्य हैं वे, जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि उन्हें तृप्‍त किया जाएगा.

  22. मत्तियाह ५:७लगभग ३१ ई.

    धन्य हैं वे, जो कृपालु हैं, क्योंकि उन पर कृपा की जाएगी.

  23. मत्तियाह ५:८लगभग ३१ ई.

    धन्य हैं वे, जिनके हृदय शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे.

  24. मत्तियाह ५:९लगभग ३१ ई.

    धन्य हैं वे, जो शांति कराने वाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की संतान कहलाएंगे.

  25. मत्तियाह ५:१०लगभग ३१ ई.

    धन्य हैं वे, जो धर्म के कारण सताए गए हैं, क्योंकि स्वर्ग-राज्य उन्हीं का है.