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circa AD 48–96

Letters to the Churches

Paul and other apostles write to strengthen, correct, and encourage the scattered churches across the Roman world.

2,767 वचन · 21 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. रोमियों ३:१५लगभग ६० ई.

    “उनके पांव लहू बहाने के लिए फुर्तीले हैं;

  2. रोमियों ३:१६लगभग ६० ई.

    विनाश तथा क्लेश उनके मार्ग में बिछे हैं,

  3. रोमियों ३:१७लगभग ६० ई.

    शांति के मार्ग से वे हमेशा अनजान हैं.”

  4. रोमियों ३:१८लगभग ६० ई.

    “उसकी दृष्टि में परमेश्वर के प्रति कोई भय है ही नहीं.”

  5. रोमियों ३:१९लगभग ६० ई.

    अब हमें यह तो मालूम हो गया कि व्यवस्था के निर्देश उन्हीं से कहते हैं, जो व्यवस्था के अधीन हैं कि हर एक मुंह बंद हो जाए और पूरा विश्व परमेश्वर के सामने हिसाब देनेवाला हो जाए

  6. रोमियों ३:२०लगभग ६० ई.

    क्योंकि सिर्फ व्यवस्था के पालन करने के द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी घोषित नहीं होगा. व्यवस्था के द्वारा सिर्फ यह अहसास होता है कि पाप क्या है.

  7. रोमियों ३:२१लगभग ६० ई.

    किंतु अब स्थिति यह है कि व्यवस्था के बिना ही परमेश्वर की धार्मिकता प्रकट हो गई है, जिसका वर्णन पवित्र शास्त्र तथा भविष्यवक्ता करते रहे थे

  8. रोमियों ३:२२लगभग ६० ई.

    अर्थात् मसीह येशु में विश्वास द्वारा उपलब्ध परमेश्वर की धार्मिकता, जो उन सबके लिए है, जो मसीह येशु में विश्वास करते हैं, क्योंकि कोई भेद नहीं

  9. रोमियों ३:२३लगभग ६० ई.

    क्योंकि पाप सभी ने किया है और सभी परमेश्वर की महिमा से दूर हो गए है

  10. रोमियों ३:२४लगभग ६० ई.

    किंतु परमेश्वर के अनुग्रह से पाप के छुटकारे द्वारा, प्रत्येक उस सेंत-मेंत छुटकारे में धर्मी घोषित किया जाता है, जो मसीह येशु में है.

  11. रोमियों ३:२५लगभग ६० ई.

    मसीह येशु, जिन्हें परमेश्वर ने उनके लहू में विश्वास द्वारा प्रायश्चित बलि के रूप में सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया. इसमें उनका लक्ष्य था कि अपनी ही धार्मिकता का सबूत मिलें, क्योंकि परमेश्वर अपनी सहनशीलता के कारण पूर्व युगों में किए गए पाप-दंड को इसलिये टालते रहे

  12. रोमियों ३:२६लगभग ६० ई.

    कि परमेश्वर इस वर्तमान युग में अपनी धार्मिकता प्रकट करें कि वह स्वयं को तथा उसे धर्मी घोषित करें, जिसका विश्वास मसीह येशु में है.

  13. रोमियों ३:२७लगभग ६० ई.

    तब हमारे घमंड का क्या हुआ? उसका बहिष्कार कर दिया गया है. किस सिद्धांत के द्वारा? कामों के सिद्धांत के द्वारा? नहीं! यह हुआ है विश्वास की व्यवस्था द्वारा.

  14. रोमियों ३:२८लगभग ६० ई.

    हमारी मान्यता यह है: मनुष्य व्यवस्था का सिर्फ पालन करने के द्वारा नहीं परंतु अपने विश्वास द्वारा धर्मी घोषित किया जाता है.

  15. रोमियों ३:२९लगभग ६० ई.

    क्या परमेश्वर सिर्फ यहूदियों ही के परमेश्वर हैं? क्या वह गैर-यहूदियों के परमेश्वर नहीं? निःसंदेह, वह उनके भी परमेश्वर हैं;

  16. रोमियों ३:३०लगभग ६० ई.

    क्योंकि परमेश्वर एक हैं. वही ख़तना किए हुओं तथा ख़तना रहित दोनों को उनके विश्वास के द्वारा धर्मी घोषित करेंगे.

  17. रोमियों ३:३१लगभग ६० ई.

    तो क्या हमारा विश्वास व्यवस्था को व्यर्थ ठहराता है? नहीं! बिलकुल नहीं! इसके विपरीत अपने विश्वास के द्वारा हम व्यवस्था को स्थिर करते हैं.

  18. रोमियों ४:१लगभग ६० ई.

    हम अपने गोत्रपिता अब्राहाम के विषय में क्या कहें—क्या था इस विषय में उनका अनुभव?

  19. रोमियों ४:२लगभग ६० ई.

    यदि कामों के द्वारा अब्राहाम को धार्मिकता प्राप्‍त हुई तो वह इसका घमंड अवश्य कर सकते थे, किंतु परमेश्वर के सामने नहीं.

  20. रोमियों ४:३लगभग ६० ई.

    पवित्र शास्त्र का लेख क्या है? अब्राहाम ने परमेश्वर में विश्वास किया और इसी को उनकी धार्मिकता के रूप में मान्यता दी गई.

  21. रोमियों ४:४लगभग ६० ई.

    मज़दूर की मज़दूरी उसका उपहार नहीं, अधिकार है.

  22. रोमियों ४:५लगभग ६० ई.

    वह व्यक्ति, जो व्यवस्था का पालन तो नहीं करता किंतु परमेश्वर में, जो अधर्मी को निर्दोष घोषित करते हैं, विश्वास करता है, इसी विश्वास के द्वारा धर्मी व्यक्ति के रूप में मान्यता प्राप्‍त करता है.

  23. रोमियों ४:६लगभग ६० ई.

    जैसे दावीद ने उस व्यक्ति की धन्यता का वर्णन किया है, जिसे परमेश्वर ने व्यवस्था का पालन न करने पर भी धर्मी घोषित किया:

  24. रोमियों ४:७लगभग ६० ई.

    धन्य हैं वे, जिनके अपराध क्षमा कर दिए गए, जिनके पापों को ढांप दिया गया है.

  25. रोमियों ४:८लगभग ६० ई.

    धन्य है वह व्यक्ति, जिसके पापों का हिसाब प्रभु कभी न लेंगे.