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circa AD 48–96

Letters to the Churches

Paul and other apostles write to strengthen, correct, and encourage the scattered churches across the Roman world.

2,767 वचन · 21 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. 1 कोरिंथ १४:२८लगभग ५९ ई.

    यदि वहां कोई अनुवाद करनेवाला न हो तो वे चुप रहें और उनकी बातें उनके तथा परमेश्वर के बीच सीमित रहे.

  2. 1 कोरिंथ १४:२९लगभग ५९ ई.

    भविष्यवाणी मात्र दो या तीन व्यक्ति ही करें और बाकी उनके वचन को परखें.

  3. 1 कोरिंथ १४:३०लगभग ५९ ई.

    यदि उसी समय किसी पर ईश्वरीय प्रकाशन हो, तो वह, जो इस समय भविष्यवाणी कर रहा है, शांत हो जाए,

  4. 1 कोरिंथ १४:३१लगभग ५९ ई.

    तुम सब एक-एक करके भविष्यवाणी कर सकते हो कि सभी को शिक्षा और प्रोत्साहन प्राप्‍त हो सके.

  5. 1 कोरिंथ १४:३२लगभग ५९ ई.

    भविष्यद्वक्ताओं का अपनी आत्मा पर पूरा नियंत्रण रहता है.

  6. 1 कोरिंथ १४:३३लगभग ५९ ई.

    परमेश्वर गड़बड़ी के नहीं, शांति के परमेश्वर हैं—पवित्र लोगों की सभी आराधना सभाओं के लिए सही यही है,

  7. 1 कोरिंथ १४:३४लगभग ५९ ई.

    कि सभाओं में स्त्रियां चुप रहें—उनको वहां बात करने की अनुमति नहीं है. व्यवस्था के अनुसार सही है कि वे अधीन बनी रहें.

  8. 1 कोरिंथ १४:३५लगभग ५९ ई.

    यदि वास्तव में उनकी जिज्ञासा का कोई विषय हो तो वे घर पर अपने पति से पूछ लिया करें; क्योंकि आराधना सभा में स्त्री का कुछ भी बोलना ठीक नहीं है.

  9. 1 कोरिंथ १४:३६लगभग ५९ ई.

    क्या परमेश्वर का वचन तुमसे निकला है? या सिर्फ तुम पर ही परमेश्वर के वचन का प्रकाशन हुआ है?

  10. 1 कोरिंथ १४:३७लगभग ५९ ई.

    यदि कोई स्वयं को भविष्यवक्ता या आत्मिक व्यक्ति समझता है तो वह यह जान ले कि मैं तुम्हें जो कुछ लिख रहा हूं, वे सब प्रभु की आज्ञाएं हैं.

  11. 1 कोरिंथ १४:३८लगभग ५९ ई.

    यदि कोई इस सच्चाई को नहीं मानता है, वह स्वयं भी माना न जाएगा.

  12. 1 कोरिंथ १४:३९लगभग ५९ ई.

    इसलिये, प्रिय भाई बहनो, भविष्यवाणी करने की क्षमता की इच्छा करते रहो, अन्य भाषा बोलने से मना न करो.

  13. 1 कोरिंथ १४:४०लगभग ५९ ई.

    तुम जो कुछ करो, वह शालीनता तथा व्यवस्थित रूप में किया जाए.

  14. 1 कोरिंथ १५:१लगभग ५९ ई.

    प्रिय भाई बहनो, अब मैं तुम्हें उसी ईश्वरीय सुसमाचार की दोबारा याद दिलाना चाहता हूं, जिसका मैंने तुम्हारे बीच प्रचार किया है, जिसे तुमने ग्रहण किया, जिसमें तुम स्थिर हो

  15. 1 कोरिंथ १५:२लगभग ५९ ई.

    और जिसके द्वारा तुम्हें उद्धार प्राप्‍त हुआ है—यदि तुम उस शिक्षा में, जिसका मैंने तुम्हारे बीच प्रचार किया है, स्थिर हो—नहीं तो व्यर्थ ही हुआ है तुम्हारा विश्वास करना.

  16. 1 कोरिंथ १५:३लगभग ५९ ई.

    मैंने तुम तक वही सच्चाई भेजी, जो सबसे महत्वपूर्ण है तथा जिसे स्वयं मैंने प्राप्‍त किया: पवित्र शास्त्र के अनुसार हमारे पापों के लिए मसीह ने प्राणों का त्याग किया;

  17. 1 कोरिंथ १५:४लगभग ५९ ई.

    वह भूमि में गाड़े गए; पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन वह मरे हुओं में से जीवित किए गए

  18. 1 कोरिंथ १५:५लगभग ५९ ई.

    और तब कैफ़स पर, इसके बाद बारह शिष्यों पर,

  19. 1 कोरिंथ १५:६लगभग ५९ ई.

    इसके बाद पांच सौ से अधिक भाई बहनों पर, जिनमें से अधिकांश अभी जीवित हैं तथा कुछ लंबी नींद में सो गए हैं, प्रकट हुए.

  20. 1 कोरिंथ १५:७लगभग ५९ ई.

    इसके बाद वह याकोब पर प्रकट हुए, इसके बाद सभी प्रेरितों पर

  21. 1 कोरिंथ १५:८लगभग ५९ ई.

    और सबसे अंत में मुझ पर भी—मैं, जिसका जन्म अविकसित अवस्था में हुआ—प्रकट हुए.

  22. 1 कोरिंथ १५:९लगभग ५९ ई.

    मैं प्रेरितों में सबसे छोटा हूं—प्रेरित कहलाने योग्य भी नहीं—क्योंकि मैंने परमेश्वर की कलीसिया को सताया था.

  23. 1 कोरिंथ १५:१०लगभग ५९ ई.

    किंतु आज मैं जो कुछ भी हूं परमेश्वर के अनुग्रह से हूं. मेरे प्रति उनका अनुग्रह व्यर्थ साबित नहीं हुआ. मैं बाकी सभी प्रेरितों की तुलना में अधिक परिश्रम करता गया, फिर भी मैं नहीं, परमेश्वर का अनुग्रह मुझमें कार्य कर रहा था.

  24. 1 कोरिंथ १५:११लगभग ५९ ई.

    प्रचार, चाहे मैं करूं या वे, संदेश वही है, जिसमें तुमने विश्वास किया है.

  25. 1 कोरिंथ १५:१२लगभग ५९ ई.

    अब यदि मरे हुओं में से जीवित किए गए मसीह हमारे प्रचार का विषय हैं तो क्या कारण है कि तुममें से कुछ की मान्यता यह है कि मरे हुओं का पुनरुत्थान जैसा कुछ नहीं होता?