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circa 800–400 BC

The Hebrew Prophets

God speaks through Isaiah, Jeremiah, and the minor prophets—calling Israel to repentance and foretelling the coming Messiah.

3,706 वचन · 14 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. योनाह ३:६लगभग ८६२ ई.पू.

    जब नीनवेह के राजा तक योनाह का समाचार पहुंचा, तो वह अपने सिंहासन से उठा, और अपने राजसी वस्त्र को उतारकर टाट को ओढ़ लिया और जाकर राख में बैठ गया.

  2. योनाह ३:७लगभग ८६२ ई.पू.

    उसने नीनवेह में यह घोषणा करवायी: “राजा और सामन्तों के फैसले के अनुसार: “कोई भी मनुष्य या पशु, गाय-बैल या भेड़-बकरी कुछ भी न खाय; उन्हें कुछ भी खाने या पीने न दिया जाय.

  3. योनाह ३:८लगभग ८६२ ई.पू.

    पर मनुष्य और पशु टाट ओढ़ें. हर एक जन तुरंत परमेश्वर की दोहाई दे और वे अपनी बुरे कामों तथा हिंसा के कार्यों को छोड़ दें.

  4. योनाह ३:९लगभग ८६२ ई.पू.

    संभव है कि परमेश्वर अपने निर्णय को बदल दें और दया करके हम पर क्रोध न करें और हम नाश होने से बच जाएं.”

  5. योनाह ३:१०लगभग ८६२ ई.पू.

    जब परमेश्वर ने उनके काम को देखा कि कैसे वे अपने बुरे कार्यों से फिर गये हैं, तो उन्होंने अपनी इच्छा बदल दी और उनके ऊपर वह विनाश नहीं लाया जिसका निर्णय उन्होंने लिया था.

  6. योनाह ४:१लगभग ८६२ ई.पू.

    परंतु योनाह को परमेश्वर का यह निर्णय गलत लगा, और वह क्रोधित हुआ.

  7. योनाह ४:२लगभग ८६२ ई.पू.

    उसने याहवेह से यह प्रार्थना की, “हे याहवेह, क्या मैंने यह नहीं कहा था, जब मैं अपने घर में था? इसलिये तरशीश को भागने के द्वारा मैंने अनुमान लगाने की कोशिश की. मैं जानता था कि आप अनुग्रहकारी और कृपालु परमेश्वर हैं; आप क्रोध करने में धीमा और प्रेम से भरे हुए हैं; आप ऐसे परमेश्वर हैं जो विपत्ति भेजने से अपने आपको रोकते हैं.

  8. योनाह ४:३लगभग ८६२ ई.पू.

    तब हे याहवेह, मेरे प्राण ले लें, क्योंकि मेरे लिये जीवित रहने से मर जाना भला है.”

  9. योनाह ४:४लगभग ८६२ ई.पू.

    परंतु याहवेह ने उत्तर दिया, “क्या तुम्हारा क्रोधित होना उचित है?”

  10. योनाह ४:५लगभग ८६२ ई.पू.

    तब योनाह बाहर जाकर शहर के पूर्व की ओर एक जगह में बैठ गया. वहां उसने अपने लिये एक छत बनायी और उसकी छाया में बैठकर इंतजार करने लगा कि अब शहर का क्या होगा.

  11. योनाह ४:६लगभग ८६२ ई.पू.

    तब याहवेह परमेश्वर ने एक पत्तीवाले पौधे को उगाया और उसे योनाह के ऊपर बढ़ाया ताकि योनाह के सिर पर छाया हो और उसे असुविधा न हो; योनाह उस पौधे के कारण बहुत खुश था.

  12. योनाह ४:७लगभग ८६२ ई.पू.

    पर अगले दिन बड़े सबेरे परमेश्वर ने एक कीड़े को भेजा, जिसने उस पौधे को कुतर डाला, जिससे वह पौधा मुरझा गया.

  13. योनाह ४:८लगभग ८६२ ई.पू.

    जब सूरज निकला, तब परमेश्वर ने एक झुलसाती पूर्वी हवा चलाई, और योनाह के सिर पर सूर्य की गर्मी पड़ने लगी, जिससे वह मूर्छित होने लगा. वह मरना चाहता था, और उसने कहा, “मेरे लिये जीवित रहने से मर जाना भला है.”

  14. योनाह ४:९लगभग ८६२ ई.पू.

    परंतु परमेश्वर ने योनाह से कहा, “क्या इस पौधे के बारे में तुम्हारा गुस्सा होना उचित है?” योनाह ने उत्तर दिया, “बिलकुल उचित है. मैं इतने गुस्से में हूं कि मेरी इच्छा है कि मैं मर जाऊं.”

  15. योनाह ४:१०लगभग ८६२ ई.पू.

    परंतु याहवेह ने कहा, “तुम इस पौधे के लिए चिंतित हो, जिसकी तुमने न तो कोई देखभाल की और न ही तुमने उसे बढ़ाया. यह रातों-रात निकला और रातों-रात यह मर भी गया.

  16. योनाह ४:११लगभग ८६२ ई.पू.

    तो फिर क्या मैं इस बड़े शहर नीनवेह की चिंता न करूं? जिसमें एक लाख बीस हजार से अधिक मनुष्य रहते हैं, जो अपने दाएं तथा बाएं हाथ के भेद को भी नहीं जानते—और इस शहर में अनेक पशु भी हैं.”

  17. मीकाह १:१लगभग ७५० ई.पू.

    यहूदिया के राजा योथाम, आहाज़ तथा हिज़किय्याह के शासनकाल में मोरेशेथवासी मीकाह के पास याहवेह का यह वचन पहुंचा, जिसे उसने शमरिया और येरूशलेम के बारे में दर्शन में देखा.

  18. मीकाह १:२लगभग ७५० ई.पू.

    हे लोगों, तुम सब सुनो, पृथ्वी और इसके सभी निवासियों, इस पर ध्यान दो, कि प्रभु अपने पवित्र मंदिर से, परम याहवेह तुम्हारे विरुद्ध गवाही दें.

  19. मीकाह १:३लगभग ७५० ई.पू.

    देखो! याहवेह अपने निवास से निकलकर आ रहे हैं; वे नीचे उतरकर पृथ्वी के ऊंचे स्थानों को रौंदते हैं.

  20. मीकाह १:४लगभग ७५० ई.पू.

    उनके पैरों के नीचे पर्वत पिघल जाते हैं और जैसे आग के आगे मोम, और जैसे ढलान से गिरता पानी, वैसे ही घाटियां तड़क कर फट जाती हैं.

  21. मीकाह १:५लगभग ७५० ई.पू.

    यह सब याकोब के अपराध, और इस्राएल के लोगों के पाप का परिणाम है. याकोब का अपराध क्या है? क्या शमरिया नहीं? यहूदिया का ऊंचा स्थान (देवताओं के पूजा-स्थल) क्या है? क्या येरूशलेम नहीं?

  22. मीकाह १:६लगभग ७५० ई.पू.

    “इसलिये मैं शमरिया को मैदान में खंडहर के ढेर सा कर दूंगा, एक ऐसी जगह जहां अंगूर की बारी लगाई जाती है. मैं उसके पत्थरों को नीचे घाटी में लुढ़का दूंगा और उसकी नीवें खुली कर दूंगा.

  23. मीकाह १:७लगभग ७५० ई.पू.

    उसकी सब मूर्तियां टुकड़े-टुकड़े कर दी जाएंगी; उसके मंदिर के सब भेटों को आग में जला दिया जाएगा; मैं उसकी सब मूर्तियों को नष्ट कर दूंगा. क्योंकि उसने अपनी भेटों को वेश्यावृत्ति करके प्राप्‍त किया है, और वेश्यावृत्ति के मजदूरी के रूप में वे फिर उपयोग में लाई जाएंगी.”

  24. मीकाह १:८लगभग ७५० ई.पू.

    इसलिये मैं रोऊंगा और विलाप करूंगा; मैं खाली पैर और नंगा चला फिरा करूंगा. मैं सियार के समान चिल्लाऊंगा और उल्लू की तरह कराहूंगा.

  25. मीकाह १:९लगभग ७५० ई.पू.

    क्योंकि शमरिया का घाव असाध्य है; यह यहूदिया में फैल गया है. यह मेरी प्रजा के द्वार तक, और तो और यह येरूशलेम तक पहुंच गया है.