circa AD 48–96
Letters to the Churches
Paul and other apostles write to strengthen, correct, and encourage the scattered churches across the Roman world.
इस काल के वचन
- फ़िलिप्पॉय १:२०लगभग ६४ ई.
मेरी हार्दिक इच्छा और आशा यह है कि मैं किसी भी परिस्थिति में लज्जित न होऊं, परंतु हमेशा की तरह अब भी निडरता में मेरे शरीर से, चाहे जीवित अवस्था में या मृत अवस्था में, मसीह की महिमा होती रहें.
- फ़िलिप्पॉय १:२१लगभग ६४ ई.
इसलिये कि मेरे लिए जीवित रहना मसीह है और मृत्यु लाभ है.
- फ़िलिप्पॉय १:२२लगभग ६४ ई.
किंतु यदि मुझे शरीर में जीना ही है तो यह मेरे लिये फलपूर्ण सार्थक परिश्रम होगा. मैं क्या चुनूं मैं नहीं जानता!
- फ़िलिप्पॉय १:२३लगभग ६४ ई.
मैं उधेड़-बुन में हूं. मेरी इच्छा तो यह है कि मैं शरीर त्याग कर मसीह के साथ जाता रहूं, यही मेरे लिए कहीं अधिक उत्तम है;
- फ़िलिप्पॉय १:२४लगभग ६४ ई.
फिर भी तुम्हारे लिए मेरा शरीर में जीवित रहना अधिक आवश्यक है.
- फ़िलिप्पॉय १:२५लगभग ६४ ई.
मेरा दृढ़ विश्वास है कि मैं जीवित रहूंगा और तुम्हारे विकास और विश्वास में आनंद के कारण तुम्हारे बीच बना रहूंगा,
- फ़िलिप्पॉय १:२६लगभग ६४ ई.
कि तुमसे भेंट करने मेरा दोबारा आना मसीह येशु में मेरे प्रति तुम्हारे गौरव को और भी अधिक बढ़ा दे.
- फ़िलिप्पॉय १:२७लगभग ६४ ई.
ध्यान रखो कि तुम्हारा स्वभाव केवल मसीह के ईश्वरीय सुसमाचार के अनुसार हो. चाहे मैं आकर तुमसे भेंट करूं या नहीं, मैं तुम्हारे विषय में यही सुनूं कि तुम एक भाव में स्थिर तथा एक मन होकर ईश्वरीय सुसमाचार के विश्वास के लिए एक साथ मेहनत करते हो.
- फ़िलिप्पॉय १:२८लगभग ६४ ई.
विरोधियों से किसी भी प्रकार भयभीत न हो—यह उनके विनाश का, किंतु तुम्हारे उद्धार का सबूत है और वह भी परमेश्वर की ओर से.
- फ़िलिप्पॉय १:२९लगभग ६४ ई.
तुम्हारे लिए मसीह के कारण यह वरदान दिया गया है कि तुम न केवल उनमें विश्वास करो, परंतु उनके लिए दुःख भी भोगो;
- फ़िलिप्पॉय १:३०लगभग ६४ ई.
उसी जलन का अनुभव करते हुए, जिसे तुमने मुझमें देखा तथा जिसके मुझमें होने के विषय में तुम अब सुन रहे हो.
- फ़िलिप्पॉय २:१लगभग ६४ ई.
इसलिये यदि मसीह में ज़रा सा भी प्रोत्साहन, प्रेम से उत्पन्न धीरज, आत्मा की सहभागिता तथा करुणा और कृपा है,
- फ़िलिप्पॉय २:२लगभग ६४ ई.
तो एक मन, एक सा प्रेम, एक ही चित्त तथा एक लक्ष्य के लिए ठान कर मेरा आनंद पूरा कर दो.
- फ़िलिप्पॉय २:३लगभग ६४ ई.
स्वार्थ और झूठी बड़ाई से कुछ भी न करो, परंतु विनम्रता के साथ तुममें से प्रत्येक अपनी बजाय दूसरे को श्रेष्ठ समझे.
- फ़िलिप्पॉय २:४लगभग ६४ ई.
तुममें से हर एक सिर्फ अपनी ही भलाई का नहीं परंतु दूसरों की भलाई का भी ध्यान रखे.
- फ़िलिप्पॉय २:५लगभग ६४ ई.
तुम्हारा स्वभाव वैसा ही हो, जैसा मसीह येशु का था:
- फ़िलिप्पॉय २:६लगभग ६४ ई.
जिन्होंने परमेश्वर के स्वरूप में होते हुए भी, परमेश्वर से अपनी तुलना पर अपना अधिकार बनाए रखना सही न समझा;
- फ़िलिप्पॉय २:७लगभग ६४ ई.
परंतु अपने आपको शून्य कर, दास का स्वरूप धारण करते हुए, और मनुष्य की समानता में हो गया.
- फ़िलिप्पॉय २:८लगभग ६४ ई.
और मनुष्य के शरीर में प्रकट होकर, अपने आपको दीन करके मृत्यु— क्रूस की मृत्यु तक, आज्ञाकारी रहकर स्वयं को शून्य बनाया.
- फ़िलिप्पॉय २:९लगभग ६४ ई.
इसलिये परमेश्वर ने उन्हें सबसे ऊंचे पद पर आसीन किया, तथा उनके नाम को महिमा दी कि वह हर एक नाम से ऊंचा हो,
- फ़िलिप्पॉय २:१०लगभग ६४ ई.
कि हर एक घुटना येशु नाम की वंदना में झुक जाए, स्वर्ग में, पृथ्वी में और पृथ्वी के नीचे,
- फ़िलिप्पॉय २:११लगभग ६४ ई.
और हर एक जीभ पिता परमेश्वर के प्रताप के लिए स्वीकार करे, कि मसीह येशु ही प्रभु हैं.
- फ़िलिप्पॉय २:१२लगभग ६४ ई.
इसलिये, मेरे प्रिय भाई बहनो, जिस प्रकार तुम हमेशा आज्ञाकारी रहे हो—न केवल मेरी उपस्थिति में परंतु उससे भी अधिक मेरी अनुपस्थिति में—अपने उद्धार के कार्य को पूरा करने की ओर डरते और कांपते हुए बढ़ते जाओ,
- फ़िलिप्पॉय २:१३लगभग ६४ ई.
क्योंकि परमेश्वर ही हैं, जिन्होंने अपनी सुइच्छा के लिए तुममें अभिलाषा और कार्य करने दोनो बातों के लिये प्रभाव डाला है.
- फ़िलिप्पॉय २:१४लगभग ६४ ई.
सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना वाद-विवाद के किया करो,