मुख्य सामग्री पर जाएँ

circa 800–400 BC

The Hebrew Prophets

God speaks through Isaiah, Jeremiah, and the minor prophets—calling Israel to repentance and foretelling the coming Messiah.

3,706 वचन · 14 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. यशायाह ५:१६लगभग ७५९ ई.पू.

    किंतु सर्वशक्तिमान याहवेह ही न्याय करेंगे, और पवित्र परमेश्वर अपनी धार्मिकता में स्वयं को पवित्र प्रकट करेंगे.

  2. यशायाह ५:१७लगभग ७५९ ई.पू.

    तब मेमने खेत में चरेंगे; तथा अमीरों की खाली जगहों पर परदेशियों को चराई के लिये जगह मिलेगी.

  3. यशायाह ५:१८लगभग ७५९ ई.पू.

    हाय उन पर जो अनर्थ को अधर्म से, तथा पाप को गाड़ी के रस्सियों से खींचते हैं,

  4. यशायाह ५:१९लगभग ७५९ ई.पू.

    जो कहते हैं, “इस्राएल के पवित्र परमेश्वर गति को बढ़ायें; और अपने कामों को जल्दी पूरा करें, ताकि हम उनकी इच्छा को जान सकें.”

  5. यशायाह ५:२०लगभग ७५९ ई.पू.

    हाय उन पर जो गलत को सही और सही को गलत कहते हैं, और अंधकार को ज्योति और ज्योति को अंधकार से, और कड़वे को मीठा तथा मीठे को कड़वा कहते हैं.

  6. यशायाह ५:२१लगभग ७५९ ई.पू.

    हाय उन पर जो अपने आपको ज्ञानी और बुद्धिमान कहते हैं.

  7. यशायाह ५:२२लगभग ७५९ ई.पू.

    हाय उन पर जो दाखमधु पीने में वीर और बनाने में बहादुर हैं,

  8. यशायाह ५:२३लगभग ७५९ ई.पू.

    जो रिश्वत लेकर अपराधी को बचा लेते हैं, और निर्दोष को दोषी बना देते हैं.

  9. यशायाह ५:२४लगभग ७५९ ई.पू.

    इस कारण, जैसे आग खूंटी को जला देती है और सूखी घास जलकर राख हो जाती है, और उनकी जड़ें सड़ जाएगी और फल हवा में उड़ जाएंगे; क्योंकि उन्होंने सर्वशक्तिमान याहवेह की व्यवस्था को ठुकरा दिया है और इस्राएल के पवित्र वचन को तुच्छ समझा है.

  10. यशायाह ५:२५लगभग ७५९ ई.पू.

    इसलिये याहवेह ने क्रोधित होकर उनको मारा तब पर्वत हिलने लगा और शव सड़कों पर बिखरे पड़े थे फिर भी वे शांत न हुए, और उनका हाथ अब तक उठा हुआ है.

  11. यशायाह ५:२६लगभग ७५९ ई.पू.

    वे दूर देश के लिए झंडा खड़ा करेंगे, और पृथ्वी के चारों ओर से लोगों को बुलाएंगे और सब तुरंत वहां आएंगे.

  12. यशायाह ५:२७लगभग ७५९ ई.पू.

    और उनमें न कोई थका हुआ होगा न ही कोई बलहीन होगा, न कोई ऊंघता है और न कोई सोता; न तो कोई बंधन खोलता है, और न कोई बांधता है.

  13. यशायाह ५:२८लगभग ७५९ ई.पू.

    उनके तीर तेज, और धनुष चढ़ाए हुए हैं; उनके घोड़ों के खुर वज्र के समान, और उनके रथों के पहिए चक्रवात के समान हैं.

  14. यशायाह ५:२९लगभग ७५९ ई.पू.

    उनकी दहाड़ सिंह के समान, हां, जो गुर्राते हुए शिकार पर झपटते हैं; और उसे उठाकर ले जाते हैं और उसका छुड़ाने वाला कोई नहीं होता.

  15. यशायाह ५:३०लगभग ७५९ ई.पू.

    उस दिन वे समुद्र में उठती लहरों के समान गरजेंगे. और सब जगह अंधकार और संकट दिखाई देगा, यहां तक कि रोशनी भी बादल में छिप जाएगी.

  16. यशायाह ६:१लगभग ७५९ ई.पू.

    यशायाह का दर्शन है उस वर्ष जब राजा उज्जियाह की मृत्यु हुई, उस वर्ष मैंने प्रभु को ऊंचे सिंहासन पर बैठे देखा, उनके वस्त्र से मंदिर ढंक गया है.

  17. यशायाह ६:२लगभग ७५९ ई.पू.

    और उनके ऊपर स्वर्गदूत दिखाई दिए जिनके छः-छः पंख थे: सबने दो पंखों से अपना मुंह ढंक रखा था, दो से अपने पैर और दो से उड़ रहे थे.

  18. यशायाह ६:३लगभग ७५९ ई.पू.

    वे एक दूसरे से इस प्रकार कह रहे थे: “पवित्र, पवित्र, पवित्र हैं सर्वशक्तिमान याहवेह; सारी पृथ्वी उनके तेज से भरी है.”

  19. यशायाह ६:४लगभग ७५९ ई.पू.

    उनकी आवाज से द्वार के कक्ष हिल गए और भवन धुएं से भरा हुआ हो गया.

  20. यशायाह ६:५लगभग ७५९ ई.पू.

    तब मैंने कहा, “हाय मुझ पर! क्योंकि मैं नष्ट हो गया हूं! मैं एक ऐसा व्यक्ति हूं, जिसके होंठ अशुद्ध हैं और मैं उन व्यक्तियों के बीच रहता हूं जिनके होंठ अशुद्ध हैं; क्योंकि मैंने अपनी आंखों से महाराजाधिराज, सर्वशक्तिमान याहवेह को देख लिया है.”

  21. यशायाह ६:६लगभग ७५९ ई.पू.

    तब एक स्वर्गदूत उड़कर मेरी ओर आया और उसके हाथ में अंगारा था, जिसे उसने चिमटे से वेदी पर से उठाया था.

  22. यशायाह ६:७लगभग ७५९ ई.पू.

    उसने इस अंगारे से मेरे मुंह पर छूते हुए कहा, “देखो, तुम्हारे होंठों से अधर्म दूर कर दिया और तुम्हारे पापों को क्षमा कर दिया गया है.”

  23. यशायाह ६:८लगभग ७५९ ई.पू.

    तब मैंने प्रभु को यह कहते हुए सुना, “मैं किसे भेजूं और कौन जाएगा हमारे लिए?” तब मैंने कहा, “मैं यहां हूं. मुझे भेजिए!”

  24. यशायाह ६:९लगभग ७५९ ई.पू.

    प्रभु ने कहा, “जाओ और इन लोगों से कहो: “ ‘सुनते रहो किंतु समझो मत; देखते रहो किंतु ग्रहण मत करो.’

  25. यशायाह ६:१०लगभग ७५९ ई.पू.

    इन लोगों के हृदय कठोर; कान बहरे और आंख से अंधे हैं. कहीं ऐसा न हो कि वे अपनी आंखों से देखकर, अपने कानों से सुनकर, और मन फिराकर मेरे पास आएं, और चंगे हो जाएं.”