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circa AD 48–96

Letters to the Churches

Paul and other apostles write to strengthen, correct, and encourage the scattered churches across the Roman world.

2,767 वचन · 21 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. तीतॉस १:१४लगभग ६५ ई.

    और यहूदियों की काल्पनिक कहानियों और सच से दूर हो गए व्यक्तियों के आदेशों की ओर ध्यान न दें.

  2. तीतॉस १:१५लगभग ६५ ई.

    निर्मल व्यक्ति के लिए सब वस्तुएं निर्मल हैं किंतु वे, जो भ्रष्‍ट हैं तथा विश्वास नहीं करते, उनके लिए निर्मल कुछ भी नहीं है. उनके मन तथा विवेक दोनों ही अशुद्ध हैं.

  3. तीतॉस १:१६लगभग ६५ ई.

    वे परमेश्वर को जानने का दावा तो अवश्य करते हैं परंतु उनके काम इसे गलत साबित करते हैं. वे घृणित, अवज्ञाकारी और किसी भी भले काम के योग्य नहीं हैं.

  4. तीतॉस २:१लगभग ६५ ई.

    किंतु तुम्हारे लिए सही यह है कि तुम ऐसी शिक्षा दो, जो खरे उपदेश के अनुसार है.

  5. तीतॉस २:२लगभग ६५ ई.

    बुज़ुर्ग पुरुष संयमी, सम्मानीय, विवेकशील तथा विश्वास, प्रेम व धीरज में अटल हों.

  6. तीतॉस २:३लगभग ६५ ई.

    इसी प्रकार बुज़ुर्ग स्त्रियां भी सम्मानीय हों. वे न तो दूसरों की बुराई करनेवाली हों और न मदिरा पीने वाली हों, परंतु वे अच्छी बातों की सीखानेवाली हों

  7. तीतॉस २:४लगभग ६५ ई.

    कि वे युवतियों को प्रेरित करें कि वे अपने पति तथा अपनी संतान से प्रेम करें,

  8. तीतॉस २:५लगभग ६५ ई.

    और वे विवेकशील, पवित्र, सुघड़ गृहणी व सुशील हों और अपने-अपने पति के अधीन रहें, जिससे परमेश्वर के वचन की निंदा न हो.

  9. तीतॉस २:६लगभग ६५ ई.

    युवकों को विवेकशील होने के लिए प्रोत्साहित करो.

  10. तीतॉस २:७लगभग ६५ ई.

    हर एक क्षेत्र में तुम भले कामों में आदर्श माने जाओ. सही शिक्षा सच्चाई और गंभीरता में दी जाए.

  11. तीतॉस २:८लगभग ६५ ई.

    तुम्हारी बातचीत के विषय में कोई बुराई न कर सके कि तुम्हारे विरोधी लज्जित हो जाएं तथा उनके सामने हमारे विरोध में कुछ भी कहने का विषय न रहे.

  12. तीतॉस २:९लगभग ६५ ई.

    दासों को सिखाओ कि हर एक परिस्थिति में वे अपने-अपने स्वामियों के अधीन रहें. वे उन्हें प्रसन्‍न रखें, उनसे वाद-विवाद न करें,

  13. तीतॉस २:१०लगभग ६५ ई.

    चोरी न करें, किंतु स्वयं को विश्वासयोग्य प्रमाणित करें कि इससे हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर की शिक्षा की शोभा बन जाए.

  14. तीतॉस २:११लगभग ६५ ई.

    सारी मानव जाति के उद्धार के लिए परमेश्वर का अनुग्रह प्रकट हुआ है,

  15. तीतॉस २:१२लगभग ६५ ई.

    जिसकी हमारे लिए शिक्षा है कि हम “गलत” कामों और सांसारिक अभिलाषाओं का त्याग कर इस युग में संयम, धार्मिकता और परमेश्वर भक्ति का जीवन जिए,

  16. तीतॉस २:१३लगभग ६५ ई.

    तथा अपने महान परमेश्वर और उद्धारकर्ता मसीह येशु की महिमा के प्रकट होने की सुखद आशा की प्रतीक्षा करें,

  17. तीतॉस २:१४लगभग ६५ ई.

    जिन्होंने स्वयं को हमारे लिए बलिदान कर हमें हर एक दुष्टता से छुड़ाकर, अपने लिए शुद्ध कर भले कामों के लिए उत्साही प्रजा बना लिया है.

  18. तीतॉस २:१५लगभग ६५ ई.

    अधिकारपूर्वक इन सब विषयों की शिक्षा देते हुए लोगों को समझाओ और प्रोत्साहित करो. इसमें कोई भी तुम्हें तुच्छ न जाने.

  19. तीतॉस ३:१लगभग ६५ ई.

    उन्हें याद दिलाओ कि वे हाकिमों तथा अधिकारियों के अधीन रहें, आज्ञाकारी रहें तथा हर एक भले काम के लिए तैयार रहें,

  20. तीतॉस ३:२लगभग ६५ ई.

    किसी की बुराई न करें, झगड़ालू नहीं, कोमल स्वभाव के हों तथा सबके साथ विनम्र रहें.

  21. तीतॉस ३:३लगभग ६५ ई.

    कभी हम भी निर्बुद्धि, आज्ञा न माननेवाले, गलत, भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के सुख-विलास के दास थे; बैरभाव, जलन और घृणा के पात्र के रूप में एक दूसरे के प्रति घृणा में जी रहे थे.

  22. तीतॉस ३:४लगभग ६५ ई.

    किंतु जब परमेश्वर, हमारे उद्धारकर्ता की कृपा तथा मानव जाति के प्रति उनका प्रेम प्रकट हुआ,

  23. तीतॉस ३:५लगभग ६५ ई.

    तो उन्होंने हमें उद्धार प्रदान किया—उन कामों के आधार पर नहीं जो हमने धार्मिकता में किए हैं परंतु अपनी ही कृपा के अनुसार नए जन्म के स्‍नान तथा पवित्र आत्मा के नवीकरण की निष्पत्ति में

  24. तीतॉस ३:६लगभग ६५ ई.

    उसी पवित्र आत्मा की पूर्ति में, जो उन्होंने हमारे उद्धारकर्ता मसीह येशु द्वारा बहुतायत में हम पर उंडेल दिया

  25. तीतॉस ३:७लगभग ६५ ई.

    कि उनके अनुग्रह के द्वारा हम धर्मी घोषित किए जाकर अनंत जीवन की आशा के अनुसार वारिस बन जाएं.