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Creation Era

Creation & The Fall

God creates the heavens and earth, forming humanity in his image before sin enters the world.

138 वचन · 1 पुस्तक शामिल

  1. उत्पत्ति १:२६लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर परमेश्वर ने कहा, “हम अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में मनुष्य की रचना करें कि वे सागर की मछलियों, आकाश के पक्षियों, पालतू पशुओं, भूमि पर रेंगनेवाले हर एक जीव तथा सारी पृथ्वी पर राज करें.”

  2. उत्पत्ति १:२७लगभग ४००४ ई.पू.

    इसलिये परमेश्वर ने अपने स्वरूप में मनुष्य को बनाया, परमेश्वर के ही स्वरूप में परमेश्वर ने उन्हें बनाया; नर और नारी करके उसने उन्हें बनाया.

  3. उत्पत्ति १:२८लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने उन्हें यह आशीष दी, “फूलो फलो और संख्या में बढ़ो और पृथ्वी में भर जाओ और सब पर अधिकार कर लो. सागर की मछलियों, आकाश के पक्षियों व पृथ्वी के सब रेंगनेवाले जीव-जन्तुओं पर तुम्हारा अधिकार हो.”

  4. उत्पत्ति १:२९लगभग ४००४ ई.पू.

    तब परमेश्वर ने उनसे कहा, “मैंने तुम्हारे खाने के लिए बीज वाले पौधे और बीज वाले फल के पेड़ आदि दिये हैं जो तुम्हारे भोजन के लिये होंगे.

  5. उत्पत्ति १:३०लगभग ४००४ ई.पू.

    और पृथ्वी के प्रत्येक पशुओं, आकाश के सब पक्षियों और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जीव-जन्तुओं को—प्रत्येक प्राणी को जिसमें जीवन का श्वास है—मैं प्रत्येक हरे पौधे भोजन के लिये देता हूं.” और वैसा ही हो गया.

  6. उत्पत्ति १:३१लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने अपनी बनाई हर चीज़ को देखा, और वह बहुत ही अच्छी थी. और शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार छठवां दिन हो गया.

  7. उत्पत्ति २:१लगभग ४००४ ई.पू.

    इस प्रकार परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी के लिए सब कुछ बनाकर अपना काम पूरा किया.

  8. उत्पत्ति २:२लगभग ४००४ ई.पू.

    सातवें दिन परमेश्वर ने अपना सब काम पूरा कर लिया था; जो उन्होंने शुरू किया था; अपने सभी कामों को पूरा करके सातवें दिन उन्होंने विश्राम किया.

  9. उत्पत्ति २:३लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी तथा उसे पवित्र ठहराया, क्योंकि यह वह दिन था, जब उन्होंने अपनी रचना, जिसकी उन्होंने सृष्टि की थी, पूरी करके विश्राम किया.

  10. उत्पत्ति २:४लगभग ४००४ ई.पू.

    यही वर्णन है कि जिस प्रकार याहवेह परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को बनाया.

  11. उत्पत्ति २:५लगभग ४००४ ई.पू.

    उस समय तक पृथ्वी में कोई हरियाली और कोई पौधा नहीं उगा था, क्योंकि तब तक याहवेह परमेश्वर ने पृथ्वी पर बारिश नहीं भेजी थी. और न खेती करने के लिए कोई मनुष्य था.

  12. उत्पत्ति २:६लगभग ४००४ ई.पू.

    भूमि से कोहरा उठता था जिससे सारी भूमि सींच जाती थी.

  13. उत्पत्ति २:७लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर याहवेह परमेश्वर ने मिट्टी से मनुष्य को बनाया तथा उसके नाक में जीवन की सांस फूंक दिया. इस प्रकार मनुष्य जीवित प्राणी हो गया.

  14. उत्पत्ति २:८लगभग ४००४ ई.पू.

    याहवेह परमेश्वर ने पूर्व दिशा में एदेन नामक स्थान में एक बगीचा बनाया और उस बगीचे में मनुष्य को रखा.

  15. उत्पत्ति २:९लगभग ४००४ ई.पू.

    याहवेह परमेश्वर ने सुंदर पेड़ और जिनके फल खाने में अच्छे हैं, उगाए और बगीचे के बीच में जीवन का पेड़ और भले या बुरे के ज्ञान के पेड़ भी लगाया.

  16. उत्पत्ति २:१०लगभग ४००४ ई.पू.

    एदेन से एक नदी बहती थी जो बगीचे को सींचा करती थी और वहां से नदी चार भागों में बंट गई.

  17. उत्पत्ति २:११लगभग ४००४ ई.पू.

    पहली नदी का नाम पीशोन; जो बहती हुई हाविलाह देश में मिल गई, जहां सोना मिलता है.

  18. उत्पत्ति २:१२लगभग ४००४ ई.पू.

    (उस देश में अच्छा सोना है. मोती एवं सुलेमानी पत्थर भी वहां पाए जाते हैं.)

  19. उत्पत्ति २:१३लगभग ४००४ ई.पू.

    दूसरी नदी का नाम गीहोन है. यह नदी कूश देश में जाकर मिलती है.

  20. उत्पत्ति २:१४लगभग ४००४ ई.पू.

    तीसरी नदी का नाम हिद्देकेल है; यह अश्शूर के पूर्व में बहती है. चौथी नदी का नाम फरात है.

  21. उत्पत्ति २:१५लगभग ४००४ ई.पू.

    याहवेह परमेश्वर ने आदम को एदेन बगीचे में इस उद्देश्य से रखा कि वह उसमें खेती करे और उसकी रक्षा करे.

  22. उत्पत्ति २:१६लगभग ४००४ ई.पू.

    याहवेह परमेश्वर ने मनुष्य से यह कहा, “तुम बगीचे के किसी भी पेड़ के फल खा सकते हो;

  23. उत्पत्ति २:१७लगभग ४००४ ई.पू.

    लेकिन भले या बुरे के ज्ञान का जो पेड़ है उसका फल तुम कभी न खाना, क्योंकि जिस दिन तुम इसमें से खाओगे, निश्चय तुम मर जाओगे.”

  24. उत्पत्ति २:१८लगभग ४००४ ई.पू.

    इसके बाद याहवेह परमेश्वर ने कहा, “आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं है. मैं उसके लिए एक सुयोग्य साथी बनाऊंगा.”

  25. उत्पत्ति २:१९लगभग ४००४ ई.पू.

    याहवेह परमेश्वर ने पृथ्वी में पशुओं तथा पक्षियों को बनाया और उन सभी को मनुष्य के पास ले आए, ताकि वह उनका नाम रखे; आदम ने जो भी नाम रखा, वही उस प्राणी का नाम हो गया.