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Creation Era
Creation & The Fall
God creates the heavens and earth, forming humanity in his image before sin enters the world.
इस काल के वचन
- उत्पत्ति १:१लगभग ४००४ ई.पू.
आदि में परमेश्वर ने आकाश एवं पृथ्वी को रचा.
- उत्पत्ति १:२लगभग ४००४ ई.पू.
पृथ्वी बिना आकार के तथा खाली थी, और पानी के ऊपर अंधकार था तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मंडरा रहा था.
- उत्पत्ति १:३लगभग ४००४ ई.पू.
उसके बाद परमेश्वर ने कहा, “प्रकाश हो जाए,” और प्रकाश हो गया.
- उत्पत्ति १:४लगभग ४००४ ई.पू.
परमेश्वर ने प्रकाश को देखा कि अच्छा है. परमेश्वर ने प्रकाश को अंधकार से अलग किया.
- उत्पत्ति १:५लगभग ४००४ ई.पू.
परमेश्वर ने प्रकाश को “दिन” तथा अंधकार को “रात” कहा और शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार पहला दिन हो गया.
- उत्पत्ति १:६लगभग ४००४ ई.पू.
फिर परमेश्वर ने कहा, “जल के बीच ऐसा विभाजन हो कि जल दो भागों में हो जाए.”
- उत्पत्ति १:७लगभग ४००४ ई.पू.
इस प्रकार परमेश्वर ने नीचे के जल और ऊपर के जल को अलग किया. यह वैसा ही हो गया.
- उत्पत्ति १:८लगभग ४००४ ई.पू.
परमेश्वर ने इस अंतर को “आकाश” नाम दिया. और शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार दूसरा दिन हो गया.
- उत्पत्ति १:९लगभग ४००४ ई.पू.
फिर परमेश्वर ने कहा, “आकाश के नीचे का पानी एक जगह इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे” और वैसा ही हो गया.
- उत्पत्ति १:१०लगभग ४००४ ई.पू.
परमेश्वर ने सूखी भूमि को “धरती” तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको “सागर” कहा और परमेश्वर ने देखा कि वह अच्छा है.
- उत्पत्ति १:११लगभग ४००४ ई.पू.
फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी से हरी घास तथा पेड़ उगने लगें: और पृथ्वी पर फलदाई वृक्षों में फल लगने लगें.” और वैसा हो गया.
- उत्पत्ति १:१२लगभग ४००४ ई.पू.
पृथ्वी हरी-हरी घास, बीजयुक्त पौधे, जिनमें अपनी-अपनी जाति का बीज होता है तथा फलदाई वृक्ष, जिनके फलों में अपनी-अपनी जाति के बीज होते हैं, उगने लगे. परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है.
- उत्पत्ति १:१३लगभग ४००४ ई.पू.
फिर शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार तीसरा दिन हो गया.
- उत्पत्ति १:१४लगभग ४००४ ई.पू.
फिर परमेश्वर ने कहा, “दिन को रात से अलग करने के लिए आकाश में ज्योतियां हों, और ये चिन्हों, समयों, दिनों एवं वर्षों के लिए होगा.
- उत्पत्ति १:१५लगभग ४००४ ई.पू.
और आकाश में ज्योतियां हों, जिससे पृथ्वी को प्रकाश मिले,” और ऐसा ही हो गया.
- उत्पत्ति १:१६लगभग ४००४ ई.पू.
परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाई—बड़ी ज्योति को दिन में तथा छोटी ज्योति को रात में राज करने हेतु बनाया. और परमेश्वर ने तारे भी बनाये.
- उत्पत्ति १:१७लगभग ४००४ ई.पू.
इन सभी को परमेश्वर ने आकाश में स्थिर किया कि ये पृथ्वी को रोशनी देते रहें,
- उत्पत्ति १:१८लगभग ४००४ ई.पू.
ताकि दिन और रात अपना काम पूरा कर सकें और रोशनी अंधकार से अलग हो. और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है.
- उत्पत्ति १:१९लगभग ४००४ ई.पू.
और शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार चौथा दिन हो गया.
- उत्पत्ति १:२०लगभग ४००४ ई.पू.
फिर परमेश्वर ने कहा, “पानी में पानी के जंतु और आकाश में उड़नेवाले पक्षी भर जायें.”
- उत्पत्ति १:२१लगभग ४००४ ई.पू.
परमेश्वर ने बड़े-बड़े समुद्री-जीवों तथा सब जातियों के जंतुओं को भी बनाया, और समुद्र को समुद्री-जीवों से भर दिया तथा सब जाति के पक्षियों की भी सृष्टि की और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है.
- उत्पत्ति १:२२लगभग ४००४ ई.पू.
इन्हें परमेश्वर ने यह कहकर आशीष दी, “समुद्र में सभी जंतु, तथा पृथ्वी में पक्षी भर जायें.”
- उत्पत्ति १:२३लगभग ४००४ ई.पू.
तब शाम हुई, फिर सुबह हुई—पांचवां दिन हो गया.
- उत्पत्ति १:२४लगभग ४००४ ई.पू.
फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी से प्रत्येक जाति के जीवित प्राणी उत्पन्न हों: पालतू पशु, रेंगनेवाले जंतु तथा हर एक जाति के वन पशु उत्पन्न हों.”
- उत्पत्ति १:२५लगभग ४००४ ई.पू.
परमेश्वर ने हर एक जाति के वन-पशुओं को, हर एक जाति के पालतू पशुओं को तथा भूमि पर रेंगनेवाले हर एक जाति के जीवों को बनाया. और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है.