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Creation Era

Creation & The Fall

God creates the heavens and earth, forming humanity in his image before sin enters the world.

138 वचन · 1 पुस्तक शामिल

  1. उत्पत्ति १:१लगभग ४००४ ई.पू.

    आदि में परमेश्वर ने आकाश एवं पृथ्वी को रचा.

  2. उत्पत्ति १:२लगभग ४००४ ई.पू.

    पृथ्वी बिना आकार के तथा खाली थी, और पानी के ऊपर अंधकार था तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मंडरा रहा था.

  3. उत्पत्ति १:३लगभग ४००४ ई.पू.

    उसके बाद परमेश्वर ने कहा, “प्रकाश हो जाए,” और प्रकाश हो गया.

  4. उत्पत्ति १:४लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने प्रकाश को देखा कि अच्छा है. परमेश्वर ने प्रकाश को अंधकार से अलग किया.

  5. उत्पत्ति १:५लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने प्रकाश को “दिन” तथा अंधकार को “रात” कहा और शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार पहला दिन हो गया.

  6. उत्पत्ति १:६लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर परमेश्वर ने कहा, “जल के बीच ऐसा विभाजन हो कि जल दो भागों में हो जाए.”

  7. उत्पत्ति १:७लगभग ४००४ ई.पू.

    इस प्रकार परमेश्वर ने नीचे के जल और ऊपर के जल को अलग किया. यह वैसा ही हो गया.

  8. उत्पत्ति १:८लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने इस अंतर को “आकाश” नाम दिया. और शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार दूसरा दिन हो गया.

  9. उत्पत्ति १:९लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर परमेश्वर ने कहा, “आकाश के नीचे का पानी एक जगह इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे” और वैसा ही हो गया.

  10. उत्पत्ति १:१०लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने सूखी भूमि को “धरती” तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको “सागर” कहा और परमेश्वर ने देखा कि वह अच्छा है.

  11. उत्पत्ति १:११लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी से हरी घास तथा पेड़ उगने लगें: और पृथ्वी पर फलदाई वृक्षों में फल लगने लगें.” और वैसा हो गया.

  12. उत्पत्ति १:१२लगभग ४००४ ई.पू.

    पृथ्वी हरी-हरी घास, बीजयुक्त पौधे, जिनमें अपनी-अपनी जाति का बीज होता है तथा फलदाई वृक्ष, जिनके फलों में अपनी-अपनी जाति के बीज होते हैं, उगने लगे. परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है.

  13. उत्पत्ति १:१३लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार तीसरा दिन हो गया.

  14. उत्पत्ति १:१४लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर परमेश्वर ने कहा, “दिन को रात से अलग करने के लिए आकाश में ज्योतियां हों, और ये चिन्हों, समयों, दिनों एवं वर्षों के लिए होगा.

  15. उत्पत्ति १:१५लगभग ४००४ ई.पू.

    और आकाश में ज्योतियां हों, जिससे पृथ्वी को प्रकाश मिले,” और ऐसा ही हो गया.

  16. उत्पत्ति १:१६लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाई—बड़ी ज्योति को दिन में तथा छोटी ज्योति को रात में राज करने हेतु बनाया. और परमेश्वर ने तारे भी बनाये.

  17. उत्पत्ति १:१७लगभग ४००४ ई.पू.

    इन सभी को परमेश्वर ने आकाश में स्थिर किया कि ये पृथ्वी को रोशनी देते रहें,

  18. उत्पत्ति १:१८लगभग ४००४ ई.पू.

    ताकि दिन और रात अपना काम पूरा कर सकें और रोशनी अंधकार से अलग हो. और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है.

  19. उत्पत्ति १:१९लगभग ४००४ ई.पू.

    और शाम हुई, फिर सुबह हुई—इस प्रकार चौथा दिन हो गया.

  20. उत्पत्ति १:२०लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर परमेश्वर ने कहा, “पानी में पानी के जंतु और आकाश में उड़नेवाले पक्षी भर जायें.”

  21. उत्पत्ति १:२१लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने बड़े-बड़े समुद्री-जीवों तथा सब जातियों के जंतुओं को भी बनाया, और समुद्र को समुद्री-जीवों से भर दिया तथा सब जाति के पक्षियों की भी सृष्टि की और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है.

  22. उत्पत्ति १:२२लगभग ४००४ ई.पू.

    इन्हें परमेश्वर ने यह कहकर आशीष दी, “समुद्र में सभी जंतु, तथा पृथ्वी में पक्षी भर जायें.”

  23. उत्पत्ति १:२३लगभग ४००४ ई.पू.

    तब शाम हुई, फिर सुबह हुई—पांचवां दिन हो गया.

  24. उत्पत्ति १:२४लगभग ४००४ ई.पू.

    फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी से प्रत्येक जाति के जीवित प्राणी उत्पन्‍न हों: पालतू पशु, रेंगनेवाले जंतु तथा हर एक जाति के वन पशु उत्पन्‍न हों.”

  25. उत्पत्ति १:२५लगभग ४००४ ई.पू.

    परमेश्वर ने हर एक जाति के वन-पशुओं को, हर एक जाति के पालतू पशुओं को तथा भूमि पर रेंगनेवाले हर एक जाति के जीवों को बनाया. और परमेश्वर ने देखा कि यह अच्छा है.