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Bread के बारे में बाइबल के वचन

22 वचन · 53 पहलू

प्रमुख बाइबल वचन

  1. चुपचाप कराहो; मरे हुओं के लिये शोकित न हो. अपनी पगड़ी बांधे रहना और अपनी जूती पहने रहना; अपनी दाढ़ी और मूंछ को न ढांकना या शोक करनेवालों की प्रथा अनुसार होनेवाला भोजन न करना.”

  2. इसलिये सुबह मैं लोगों से बात किया, और शाम को मेरी पत्नी मर गई. उसके अगले सुबह मैंने वैसा ही किया, जैसा मुझे आदेश दिया गया था.

  3. तब लोग मुझसे पूछने लगे, “क्या तुम हमें नहीं बताओगे कि इन चीज़ों का हमसे क्या लेना देना है? तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?”

  4. इसलिये मैंने उनसे कहा, “याहवेह का वचन मेरे पास आया:

  5. इस्राएल के लोगों से कहो, ‘परम प्रधान याहवेह का यह कहना है: मैं अपने पवित्र स्थान को अपवित्र करने ही वाला हूं—वह दृढ़ गढ़, जिस पर घमंड करते हो, तुम्हारे आंखों की खुशी, तुम्हारे स्नेह का पात्र. तुम्हारे बेटे और बेटियां, जो तुम्हारे पीछे रह जाएंगे, वे तलवार से मारे जाएंगे.

  6. और तुम वैसा ही करोगे, जैसा मैंने किया है. तुम अपने दाढ़ी और मूंछ को नहीं ढंकोगे या शोक करनेवालों की प्रथा अनुसार होनेवाला भोजन नहीं खाओगे.

  7. वे सबके सब व्यभिचारी हैं, एक जलते हुए चूल्हे के समान जिसकी आग को रोटी बनानेवाला तब तक तेज नहीं करता जब तक वह आटा गूंधकर पकाने के लिए तैयार नहीं कर लेता.

  8. हमारे राजा के त्योहार के दिन राजकुमार दाखमधु पीकर उत्तेजित होते हैं, और वह हंसी उड़ानेवालों के साथ शामिल होता है.

  9. उनके ह्रदय एक चूल्हे के समान हैं; वे उसके पास षड़्‍यंत्र रचकर जाते हैं. उनकी लालसा रात भर सुलगती रहती है; और सुबह यह आग की ज्वाला की तरह भभक उठती है.

  10. वे सबके सब चूल्हे के समान गर्म हैं; वे अपने शासकों को भस्म कर देते हैं. उनके सब राजा मारे जाते हैं, पर उनमें से कोई भी मुझे नहीं पुकारता.

  11. लोगों को घास पर बैठने की आज्ञा देते हुए येशु ने पांचों रोटियां और दो मछलियां अपने हाथों में लेकर स्वर्ग की ओर आंखें उठाकर भोजन के लिए धन्यवाद देने के बाद रोटियां तोड़-तोड़ कर शिष्यों को देना प्रारंभ किया और शिष्यों ने भीड़ को.

  12. सभी ने भरपेट खाया. शेष रह गए टुकड़े इकट्ठा करने पर बारह टोकरे भर गए.

  13. वहां जितनों ने भोजन किया था उनमें स्त्रियों और बालकों को छोड़कर पुरुषों की संख्या ही कोई पांच हज़ार थी.

  14. येशु ने उनसे प्रश्न किया, “कितनी रोटियां हैं तुम्हारे पास?” “सात, और कुछ छोटी मछलियां,” उन्होंने उत्तर दिया.

  15. येशु ने भीड़ को भूमि पर बैठ जाने का निर्देश दिया

  16. और स्वयं उन्होंने सातों रोटियां और मछलियां लेकर उनके लिए परमेश्वर के प्रति आभार प्रकट करने के बाद उन्हें तोड़ा और शिष्यों को देते गए तथा शिष्य भीड़ को.

  17. सभी ने खाया और तृप्‍त हुए और शिष्यों ने तोड़ी गई रोटियों के शेष टुकड़ों को इकट्ठा कर सात बड़े टोकरे भर लिए.

  18. क्योंकि परमेश्वर की रोटी वह है, जो स्वर्ग से आती है, और संसार को जीवन प्रदान करती है.”

  19. यह सुनकर उन्होंने विनती की, “प्रभु, अब से हमें यही रोटी दें.”

  20. इस पर मसीह येशु ने घोषणा की, “मैं ही हूं वह जीवन की रोटी. जो मेरे पास आएगा, वह भूखा न रहेगा और जो मुझमें विश्वास करेगा, कभी प्यासा न रहेगा.

  21. जो मैंने प्रभु से प्राप्‍त किया, वह मैंने तुम्हें भी सौंप दिया: प्रभु येशु मसीह ने, जिस रात उन्हें पकड़वाया जा रहा था, रोटी ली,

  22. धन्यवाद देने के बाद उसे तोड़ा और कहा, “तुम्हारे लिए यह मेरा शरीर है. यह मेरी याद में किया करना.”