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circa 6 BC – AD 30

The Life of Jesus

The eternal Son of God enters history: born in Bethlehem, baptized in the Jordan, crucified at Golgotha, raised on the third day.

3,779 वचन · 4 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. योहन ९:३०लगभग ३३ ई.

    उसने उनसे कहा, “तब तो यह बड़े आश्चर्य का विषय है! आपको यह भी मालूम नहीं कि वह कहां से हैं जबकि उन्होंने मुझे आंखों की रोशनी दी है!

  2. योहन ९:३१लगभग ३३ ई.

    हम सभी जानते हैं कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनते—वह उसकी सुनते हैं, जो परमेश्वर के भक्त है तथा उनकी इच्छा पूरी करते है.

  3. योहन ९:३२लगभग ३३ ई.

    आदिकाल से कभी ऐसा सुनने में नहीं आया कि किसी ने जन्म के अंधे को आंखों की रोशनी दी हो.

  4. योहन ९:३३लगभग ३३ ई.

    यदि वह परमेश्वर की ओर से न होते तो वह कुछ भी नहीं कर सकते थे.”

  5. योहन ९:३४लगभग ३३ ई.

    यह सुन उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, “तू! तू तो पूरी तरह से पाप में जन्मा है और हमें सिखाता है!” यह कहते हुए उन्होंने उसे यहूदी सभागृह से बाहर निकाल दिया.

  6. योहन ९:३५लगभग ३३ ई.

    जब मसीह येशु ने यह सुना कि यहूदियों ने उस व्यक्ति को सभागृह से बाहर निकाल दिया है तो उससे मिलने पर उन्होंने प्रश्न किया, “क्या तुम मनुष्य के पुत्र में विश्वास करते हो?”

  7. योहन ९:३६लगभग ३३ ई.

    उसने पूछा, “प्रभु, वह कौन हैं कि मैं उनमें विश्वास करूं?”

  8. योहन ९:३७लगभग ३३ ई.

    मसीह येशु ने उससे कहा, “उसे तुमने देखा है और जो तुमसे बातें कर रहा है, वह वही है.”

  9. योहन ९:३८लगभग ३३ ई.

    उसने उत्तर दिया, “मैं विश्वास करता हूं, प्रभु!” और उसने दंडवत करते हुए उनकी वंदना की.

  10. योहन ९:३९लगभग ३३ ई.

    तब मसीह येशु ने कहा, “मैं इस संसार में न्याय के लिए ही आया हूं कि जो नहीं देखते, वे देखें और जो देखते हैं, वे अंधे हो जाएं.”

  11. योहन ९:४०लगभग ३३ ई.

    वहां खड़े कुछ फ़रीसियों ने इन शब्दों को सुनकर कहा, “तो क्या हम भी अंधे हैं?”

  12. योहन ९:४१लगभग ३३ ई.

    मसीह येशु ने उनसे कहा, “यदि तुम अंधे होते तो तुम दोषी न होते किंतु इसलिये कि तुम कहते हो, ‘हम देखते हैं,’ तुम्हारा दोष बना रहता है.

  13. योहन १०:१लगभग ३३ ई.

    “मैं तुम फ़रीसियों पर यह अटल सच्चाई प्रकट कर रहा हूं. वह, जो भेड़शाला में द्वार से प्रवेश नहीं करता परंतु बाड़ा फांद कर घुसता है, चोर और लुटेरा है,

  14. योहन १०:२लगभग ३३ ई.

    परंतु जो द्वार से प्रवेश करता है, वह भेड़ों का चरवाहा है.

  15. योहन १०:३लगभग ३३ ई.

    उसके लिए द्वारपाल द्वार खोल देता है, भेड़ें उसकी आवाज सुनती हैं. वह अपनी भेड़ों को नाम लेकर बुलाता और उन्हें बाहर ले जाता है.

  16. योहन १०:४लगभग ३३ ई.

    अपनी सब भेड़ों को बाहर निकाल लेने के बाद वह उनके आगे-आगे चलता है और भेड़ें उसके पीछे-पीछे क्योंकि वे उसकी आवाज पहचानती हैं.

  17. योहन १०:५लगभग ३३ ई.

    वे किसी अनजान के पीछे कभी नहीं चलेंगी परंतु उससे भागेंगी क्योंकि वे उस अनजान की आवाज नहीं पहचानतीं.”

  18. योहन १०:६लगभग ३३ ई.

    मसीह येशु के इस दृष्टांत का मतलब सुननेवाले फ़रीसी नहीं समझे कि वह उनसे कहना क्या चाह रहे थे.

  19. योहन १०:७लगभग ३३ ई.

    इसलिये मसीह येशु ने दोबारा कहा, “मैं तुम पर यह अटल सच्चाई प्रकट कर रहा हूं: भेड़ों का द्वार मैं ही हूं.

  20. योहन १०:८लगभग ३३ ई.

    वे सभी, जो मुझसे पहले आए, चोर और लुटेरे थे. भेड़ों ने उनकी नहीं सुनी.

  21. योहन १०:९लगभग ३३ ई.

    द्वार मैं ही हूं. यदि कोई मुझसे होकर प्रवेश करता है तो उद्धार प्राप्‍त करेगा. वह भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा.

  22. योहन १०:१०लगभग ३३ ई.

    चोर किसी अन्य उद्देश्य से नहीं, मात्र चुराने, हत्या करने और नाश करने आता है; मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं और बहुतायत का जीवन पाएं.

  23. योहन १०:११लगभग ३३ ई.

    “मैं ही हूं अच्छा चरवाहा. अच्छा चरवाहा अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण दे देता है.

  24. योहन १०:१२लगभग ३३ ई.

    मज़दूर, जो न तो चरवाहा है और न भेड़ों का स्वामी, भेड़िये को आते देख भेड़ों को छोड़कर भाग जाता है. भेड़िया उन्हें पकड़ता है और वे तितर-बितर हो जाती हैं.

  25. योहन १०:१३लगभग ३३ ई.

    इसलिये कि वह मज़दूर है, उसे भेड़ों की कोई चिंता नहीं है.