circa 6 BC – AD 30
The Life of Jesus
The eternal Son of God enters history: born in Bethlehem, baptized in the Jordan, crucified at Golgotha, raised on the third day.
इस काल के वचन
- मत्तियाह १४:२३लगभग ३२ ई.
भीड़ को विदा करने के बाद वह अकेले पर्वत पर चले गए कि वहां जाकर वह एकांत में प्रार्थना करें. यह रात का समय था और वह वहां अकेले थे.
- मत्तियाह १४:२४लगभग ३२ ई.
विपरीत दिशा में हवा तथा लहरों के थपेड़े खाकर नाव तट से बहुत दूर निकल चुकी थी.
- मत्तियाह १४:२५लगभग ३२ ई.
रात के अंतिम प्रहर में येशु जल सतह पर चलते हुए उनकी ओर आए.
- मत्तियाह १४:२६लगभग ३२ ई.
उन्हें जल सतह पर चलते देख शिष्य घबराकर कहने लगे, “दुष्टात्मा है यह!” और वे भयभीत हो चिल्लाने लगे.
- मत्तियाह १४:२७लगभग ३२ ई.
इस पर येशु ने उनसे कहा, “डरो मत. साहस रखो! मैं हूं!”
- मत्तियाह १४:२८लगभग ३२ ई.
पेतरॉस ने उनसे कहा, “प्रभु! यदि आप ही हैं तो मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं जल पर चलते हुए आपके पास आ जाऊं.”
- मत्तियाह १४:२९लगभग ३२ ई.
“आओ!” येशु ने आज्ञा दी. पेतरॉस नाव से उतरकर जल पर चलते हुए येशु की ओर बढ़ने लगे
- मत्तियाह १४:३०लगभग ३२ ई.
किंतु जब उनका ध्यान हवा की गति की ओर गया तो वह भयभीत हो गए और जल में डूबने लगे. वह चिल्लाए, “प्रभु! मुझे बचाइए!”
- मत्तियाह १४:३१लगभग ३२ ई.
येशु ने तुरंत हाथ बढ़ाकर उन्हें थाम लिया और कहा, “अरे, अल्प विश्वासी! तुमने संदेह क्यों किया?”
- मत्तियाह १४:३२लगभग ३२ ई.
तब वे दोनों नाव में चढ़ गए और वायु थम गई.
- मत्तियाह १४:३३लगभग ३२ ई.
नाव में सवार शिष्यों ने यह कहते हुए येशु की वंदना की, “सचमुच आप ही परमेश्वर-पुत्र हैं.”
- मत्तियाह १४:३४लगभग ३२ ई.
झील पार कर वे गन्नेसरत प्रदेश में आ गए.
- मत्तियाह १४:३५लगभग ३२ ई.
वहां के निवासियों ने उन्हें पहचान लिया और आस-पास के स्थानों में संदेश भेज दिया. लोग बीमार व्यक्तियों को उनके पास लाने लगे.
- मत्तियाह १४:३६लगभग ३२ ई.
वे येशु से विनती करने लगे, कि वह उन्हें मात्र अपने वस्त्र का छोर ही छू लेने दें. अनेकों ने उनका वस्त्र छुआ और स्वस्थ हो गए.
- मत्तियाह १५:१लगभग ३२ ई.
तब येरूशलेम से कुछ फ़रीसी और शास्त्री येशु के पास आकर कहने लगे,
- मत्तियाह १५:२लगभग ३२ ई.
“आपके शिष्य पूर्वजों की परंपराओं का उल्लंघन क्यों करते हैं? वे भोजन के पहले हाथ नहीं धोया करते.”
- मत्तियाह १५:३लगभग ३२ ई.
येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “अपनी परंपराओं की पूर्ति में आप स्वयं परमेश्वर के आदेशों को क्यों तोड़ते हैं?
- मत्तियाह १५:४लगभग ३२ ई.
परमेश्वर की आज्ञा है, ‘अपने माता-पिता का सम्मान करो’ और वह, जो माता या पिता के प्रति बुरे शब्द बोले, उसे मृत्यु दंड दिया जाए.
- मत्तियाह १५:५लगभग ३२ ई.
किंतु तुम कहते हो, ‘जो कोई अपने माता-पिता से कहता है, “आपको मुझसे जो कुछ प्राप्त होना था, वह सब अब परमेश्वर को भेंट किया जा चुका है,”
- मत्तियाह १५:६लगभग ३२ ई.
उसे माता-पिता का सम्मान करना आवश्यक नहीं.’ ऐसा करने के द्वारा अपनी ही परंपराओं को पूरा करने की फिराक में तुम परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ते हो.
- मत्तियाह १५:७लगभग ३२ ई.
अरे पाखंडियों! भविष्यवक्ता यशायाह की यह भविष्यवाणी तुम्हारे विषय में ठीक ही है:
- मत्तियाह १५:८लगभग ३२ ई.
“ये लोग मात्र अपने होंठों से मेरा सम्मान करते हैं, किंतु उनके हृदय मुझसे बहुत दूर हैं.
- मत्तियाह १५:९लगभग ३२ ई.
व्यर्थ में वे मेरी वंदना करते हैं. उनकी शिक्षा सिर्फ मनुष्यों द्वारा बनाए हुए नियम हैं.”
- मत्तियाह १५:१०लगभग ३२ ई.
तब येशु ने भीड़ को अपने पास बुलाकर उनसे कहा, “सुनो और समझो:
- मत्तियाह १५:११लगभग ३२ ई.
वह, जो मनुष्य के मुख में प्रवेश करता है, मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता, परंतु उसे अशुद्ध वह करता है, जो उसके मुख से निकलता है.”