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दुःख की ताड़ना
विलापगीत ३:२७-३९
२७
मनुष्य के लिए हितकर यही है कि वह आरंभ ही से अपना जूआ उठाए.
२८
वह एकाकी हो शांतिपूर्वक इसे स्वीकार कर ले, जब कभी यह उस पर आ पड़ता है.
२९
वह अपना मुख धूलि पर ही रहने दे— आशा कभी मृत नहीं होती.
३०
वह अपना गाल उसे प्रस्तुत कर दे, जो उस प्रहार के लिए तैयार है, वह समस्त अपमान स्वीकार कर ले.
३१
प्रभु का परित्याग चिरस्थायी नहीं हुआ करता.
३२
यद्यपि वह पीड़ा के कारण तो हो जाते हैं, किंतु करुणा का सागर भी तो वही हैं, क्योंकि अथाह होता है उनका करुणा-प्रेम.
३३
पीड़ा देना उनका सुख नहीं होता न ही मनुष्यों को यातना देना उनका आनंद होता है.
३४
पृथ्वी के समस्त बंदियों का दमन,
३५
परम प्रधान की उपस्थिति में न्याय-वंचना,
३६
किसी की न्याय-दोहाई में की गई विकृति में याहवेह का समर्थन कदापि नहीं होता?
३७
यदि स्वयं प्रभु ने कोई घोषणा न की हो, तो किसमें यह सामर्थ्य है, कि जो कुछ उसने कहा है, वह पूरा होगा?
३८
क्या यह तथ्य नहीं कि अनुकूल अथवा प्रतिकूल, जो कुछ घटित होता है, वह परम प्रधान के बोलने के द्वारा ही होता है?
३९
भला कोई जीवित मनुष्य अपने पापों के दंड के लिए परिवाद कैसे कर सकता है?
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