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circa 6 BC – AD 30

The Life of Jesus

The eternal Son of God enters history: born in Bethlehem, baptized in the Jordan, crucified at Golgotha, raised on the third day.

3,779 वचन · 4 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. योहन ५:३५लगभग ३१ ई.

    योहन वह जलता हुआ और चमकता हुआ दीपक थे, जिनके उजाले में तुम्हें कुछ समय तक आनंद मनाना सुखद लगा.

  2. योहन ५:३६लगभग ३१ ई.

    “मेरी गवाही योहन की गवाही से अधिक बड़ी है क्योंकि पिता द्वारा मुझे सौंपे गए काम को पूरा करना ही इस सच्चाई का सबूत है कि पिता ने मुझे भेजा है.

  3. योहन ५:३७लगभग ३१ ई.

    इसके अतिरिक्त पिता अर्थात् स्वयं मेरे भेजनेवाले ने भी मेरे विषय में गवाही दी है. तुमने न तो कभी उनकी आवाज सुनी है, न उनका रूप देखा है

  4. योहन ५:३८लगभग ३१ ई.

    और न ही उनका वचन तुम्हारे हृदय में स्थिर रह सका है क्योंकि जिसे उन्होंने भेजा है, तुम उसमें विश्वास नहीं करते.

  5. योहन ५:३९लगभग ३१ ई.

    तुम शास्त्रों का मनन इस विश्वास में करते हो कि उनमें अनंत काल का जीवन बसा है. ये सभी शास्त्र मेरे ही विषय में गवाही देते हैं.

  6. योहन ५:४०लगभग ३१ ई.

    यह सब होने पर भी जीवन पाने के लिए तुम मेरे पास आना नहीं चाहते.

  7. योहन ५:४१लगभग ३१ ई.

    “मनुष्य की प्रशंसा मुझे स्वीकार नहीं

  8. योहन ५:४२लगभग ३१ ई.

    क्योंकि मैं तुम्हें जानता हूं और मुझे यह भी मालूम है कि परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे मन में है ही नहीं.

  9. योहन ५:४३लगभग ३१ ई.

    तुम मुझे ग्रहण नहीं करते जबकि मैं अपने पिता के नाम में आया हूं किंतु यदि कोई अपने ही नाम में आए तो तुम उसे ग्रहण कर लोगे.

  10. योहन ५:४४लगभग ३१ ई.

    तुम मुझमें विश्वास कैसे कर सकते हो यदि तुम एक दूसरे से प्रशंसा की आशा करते हो और उस प्रशंसा के लिए कोई प्रयास नहीं करते, जो एकमात्र परमेश्वर से प्राप्‍त होती है?

  11. योहन ५:४५लगभग ३१ ई.

    “यह विचार अपने मन से निकाल दो कि पिता के सामने मैं तुम पर आरोप लगाऊंगा; तुम पर दोषारोपण तो मोशेह करेंगे—मोशेह, जिन पर तुमने आशा लगा रखी है.

  12. योहन ५:४६लगभग ३१ ई.

    यदि तुम वास्तव में मोशेह में विश्वास करते तो मुझमें भी करते क्योंकि उन्होंने मेरे ही विषय में लिखा है.

  13. योहन ५:४७लगभग ३१ ई.

    जब तुम उनके लेखों का ही विश्वास नहीं करते तो मेरी बातों का विश्वास कैसे करोगे?”

  14. योहन ६:१लगभग ३२ ई.

    इन बातों के बाद मसीह येशु गलील अर्थात् तिबेरियॉस झील के उस पार चले गए.

  15. योहन ६:२लगभग ३२ ई.

    उनके द्वारा रोगियों को स्वास्थ्यदान के अद्भुत चिह्नों से प्रभावित एक बड़ी भीड़ उनके साथ हो ली.

  16. योहन ६:३लगभग ३२ ई.

    मसीह येशु पर्वत पर जाकर वहां अपने शिष्यों के साथ बैठ गए.

  17. योहन ६:४लगभग ३२ ई.

    यहूदियों का फ़सह उत्सव पास था.

  18. योहन ६:५लगभग ३२ ई.

    जब मसीह येशु ने बड़ी भीड़ को अपनी ओर आते देखा तो फ़िलिप्पॉस से पूछा, “इन सबको खिलाने के लिए हम भोजन कहां से मोल लेंगे?”

  19. योहन ६:६लगभग ३२ ई.

    मसीह येशु ने यह प्रश्न उन्हें परखने के लिए किया था क्योंकि वह जानते थे कि वह क्या करने पर थे.

  20. योहन ६:७लगभग ३२ ई.

    फ़िलिप्पॉस ने उत्तर दिया, “दो सौ दीनार की रोटियां भी उनके लिए पर्याप्‍त नहीं होंगी कि हर एक को थोड़ी-थोड़ी मिल पाए.”

  21. योहन ६:८लगभग ३२ ई.

    मसीह येशु के शिष्य शिमओन पेतरॉस के भाई आन्द्रेयास ने उन्हें सूचित किया,

  22. योहन ६:९लगभग ३२ ई.

    “यहां एक लड़का है, जिसके पास जौ की पांच रोटियां और दो मछलियां हैं किंतु उनसे इतने लोगों का क्या होगा?”

  23. योहन ६:१०लगभग ३२ ई.

    मसीह येशु ने कहा, “लोगों को बैठा दो” और वे सब, जिनमें पुरुषों की ही संख्या पांच हज़ार थी, घनी घास पर बैठ गए.

  24. योहन ६:११लगभग ३२ ई.

    तब मसीह येशु ने रोटियां लेकर धन्यवाद दिया और उनकी ज़रूरत के अनुसार बांट दीं और उसी प्रकार मछलियां भी.

  25. योहन ६:१२लगभग ३२ ई.

    जब वे सब तृप्‍त हो गए तो मसीह येशु ने अपने शिष्यों को आज्ञा दी, “शेष टुकड़ों को इकट्ठा कर लो कि कुछ भी नाश न हो,”