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circa AD 48–96

Letters to the Churches

Paul and other apostles write to strengthen, correct, and encourage the scattered churches across the Roman world.

2,767 वचन · 21 पुस्तकें शामिल

पुस्तक के अनुसार छाँटें
  1. इफ़ेसॉस ४:९लगभग ६४ ई.

    (इस कहावत का मतलब क्या हो सकता है कि वह “सबसे ऊंचे पर चढ़ गए,” सिवाय इसके कि वह पहले अधोलोक में नीचे उतर गए?

  2. इफ़ेसॉस ४:१०लगभग ६४ ई.

    वह, जो नीचे उतरे, वही हैं, जो आसमानों से भी ऊंचे स्थान में बड़े सम्मान के साथ चढ़े कि सारे सृष्टि को परिपूर्ण कर दें.)

  3. इफ़ेसॉस ४:११लगभग ६४ ई.

    उन्होंने कलीसिया को कुछ प्रेरित, कुछ भविष्यद्वक्ता, कुछ ईश्वरीय सुसमाचार सुनानेवाले तथा कुछ कलीसिया के रखवाले उपदेशक प्रदान किए,

  4. इफ़ेसॉस ४:१२लगभग ६४ ई.

    कि पवित्र सेवकाई के लिए सुसज्जित किए जाएं, कि मसीह का शरीर विकसित होता जाए

  5. इफ़ेसॉस ४:१३लगभग ६४ ई.

    जब तक हम सभी को विश्वास और परमेश्वर-पुत्र के बहुत ज्ञान की एकता उपलब्ध न हो जाए—सिद्ध मनुष्य के समान—जो मसीह का संपूर्ण डीलडौल है.

  6. इफ़ेसॉस ४:१४लगभग ६४ ई.

    तब हम बालक न रहेंगे, जो समुद्री लहरों जैसे इधर-उधर उछाले व फेंके जाते तथा मनुष्यों की ठग विद्या की आंधी और मनुष्य की चतुराइयों द्वारा बहाए जाते हैं.

  7. इफ़ेसॉस ४:१५लगभग ६४ ई.

    परंतु सच को प्रेमपूर्वक व्यक्त करते हुए हर एक पक्ष में हमारी उन्‍नति उनमें होती जाए, जो प्रधान हैं, अर्थात्, मसीह.

  8. इफ़ेसॉस ४:१६लगभग ६४ ई.

    जिनके द्वारा सारा शरीर जोड़ों द्वारा गठकर और एक साथ मिलकर प्रेम में विकसित होता जाता है क्योंकि हर एक अंग अपना तय किया गया काम ठीक-ठाक करता जाता है.

  9. इफ़ेसॉस ४:१७लगभग ६४ ई.

    इसलिये मैं प्रभु के साथ पुष्टि करते हुए तुमसे विनती के साथ कहता हूं कि अब तुम्हारा स्वभाव गैर-यहूदियों के समान खोखली मन की रीति से प्रेरित न हो.

  10. इफ़ेसॉस ४:१८लगभग ६४ ई.

    उनके मन की कठोरता से उत्पन्‍न अज्ञानता के कारण वे परमेश्वर के जीवन से अलग हैं और उनकी बुद्धि अंधेरी हो गई है.

  11. इफ़ेसॉस ४:१९लगभग ६४ ई.

    सुन्‍न होकर उन्होंने स्वयं को लोभ से भरकर सब प्रकार की कामुकता और अनैतिकता के अधीन कर दिया है.

  12. इफ़ेसॉस ४:२०लगभग ६४ ई.

    मसीह के विषय में ऐसी शिक्षा तुम्हें नहीं दी गई थी

  13. इफ़ेसॉस ४:२१लगभग ६४ ई.

    यदि वास्तव में तुमने उनके विषय में सुना और उनकी शिक्षा को ग्रहण किया है, जो मसीह येशु में सच के अनुरूप है.

  14. इफ़ेसॉस ४:२२लगभग ६४ ई.

    इसलिये अपने पुराने स्वभाव से प्रेरित स्वभाव को त्याग दो, जो छल की लालसाओं के कारण भ्रष्‍ट होता जा रहा है;

  15. इफ़ेसॉस ४:२३लगभग ६४ ई.

    कि तुम्हारे मन का स्वभाव नया हो जाए;

  16. इफ़ेसॉस ४:२४लगभग ६४ ई.

    नए स्वभाव को धारण कर लो, जिसकी रचना धार्मिकता और पवित्रता में परमेश्वर के स्वरूप में हुई है.

  17. इफ़ेसॉस ४:२५लगभग ६४ ई.

    इसलिये झूठ का त्याग कर, हर एक व्यक्ति अपने पड़ोसी से सच ही कहे क्योंकि हम एक ही शरीर के अंग हैं.

  18. इफ़ेसॉस ४:२६लगभग ६४ ई.

    “यदि तुम क्रोधित होते भी हो, तो भी पाप न करो.” सूर्यास्त तक तुम्हारे क्रोध का अंत हो जाए,

  19. इफ़ेसॉस ४:२७लगभग ६४ ई.

    शैतान को कोई अवसर न दो.

  20. इफ़ेसॉस ४:२८लगभग ६४ ई.

    वह, जो चोरी करता रहा है, अब चोरी न करे किंतु परिश्रम करे कि वह अपने हाथों से किए गए उपयोगी कामों के द्वारा अन्य लोगों की भी सहायता कर सके, जिन्हें किसी प्रकार की ज़रूरत है.

  21. इफ़ेसॉस ४:२९लगभग ६४ ई.

    तुम्हारे मुख से कोई भद्दे शब्द नहीं परंतु ऐसा वचन निकले, जो अवसर के अनुकूल, अन्यों के लिए अनुग्रह का कारण तथा सुननेवालों के लिए भला हो.

  22. इफ़ेसॉस ४:३०लगभग ६४ ई.

    परमेश्वर की पवित्र आत्मा को शोकित न करो, जिनके द्वारा तुम्हें छुटकारे के दिन के लिए छाप दी गई है.

  23. इफ़ेसॉस ४:३१लगभग ६४ ई.

    सब प्रकार की कड़वाहट, रोष, क्रोध, झगड़ा, निंदा, आक्रोश तथा बैरभाव को स्वयं से अलग कर दो.

  24. इफ़ेसॉस ४:३२लगभग ६४ ई.

    एक दूसरे के प्रति कृपालु तथा सहृदय बने रहो, तथा एक दूसरे को उसी प्रकार क्षमा करो, जिस प्रकार परमेश्वर ने मसीह में तुम्हें क्षमा किया है.

  25. इफ़ेसॉस ५:१लगभग ६४ ई.

    परमेश्वर की प्रेम पात्र संतान होने के नाते, तुम परमेश्वर के पीछे चलनेवाले बनो.