रोमियों १५:१-१३
१
आवश्यक है कि हम, जो विश्वास में मजबूत हैं, कमज़ोरों की कमज़ोरी के प्रति धीरज का भाव रखें न कि सिर्फ अपनी प्रसन्नता का.
२
हममें से प्रत्येक अपने पड़ोसी की भलाई तथा उन्नति के लिए उसकी प्रसन्नता का ध्यान रखे.
३
क्योंकि मसीह ने अपने आपको प्रसन्न नहीं किया जैसा कि पवित्र शास्त्र का लेख है: उनकी निंदा, जो आपके निंदक हैं, मुझ पर आ पड़ी है.
४
पहले समय के सभी अभिलेख हमें शिक्षा देने के उद्देश्य से लिखे गए कि निरंतर प्रयास तथा पवित्र शास्त्र के प्रोत्साहन द्वारा हममें आशा का अनुभव हो.
५
परमेश्वर, जो धीरज और प्रोत्साहन के दाता है, तुममें मसीह येशु के अनुरूप आपस में एकता का भाव उत्पन्न करें
६
कि तुम एक मन और एक शब्द में परमेश्वर, हमारे प्रभु येशु मसीह के पिता का धन्यवाद और महिमा करो.
७
इसलिये एक दूसरे को स्वीकार करो—ठीक जिस प्रकार मसीह ने परमेश्वर की महिमा के लिए हमें स्वीकार किया है.
८
सुनो, परमेश्वर की सच्चाई की पुष्टि करने के लिए मसीह येशु ख़तना किए हुए लोगों के सेवक बन गए कि पूर्वजों से की गई प्रतिज्ञाओं की पुष्टि हो
९
तथा गैर-यहूदी परमेश्वर की कृपादृष्टि के लिए उनकी महिमा करें, जैसा कि पवित्र शास्त्र का लेख है: इसलिये मैं गैर-यहूदियों के बीच आपका धन्यवाद करूंगा; मैं आपके नाम का गुणगान करूंगा.
१०
फिर लिखा है: गैर-यहूदियों! परमेश्वर की प्रजा के साथ मिलकर आनंद करो.
११
और यह भी: सभी गैर-यहूदियों! तुम प्रभु का धन्यवाद करो; सभी जनता उनका धन्यवाद करें.
१२
भविष्यवक्ता यशायाह ने भी कहा: यिशै की जड़ में कोपलें होंगी, तथा वह, जो उठेगा, गैर-यहूदियों पर शासन करेगा; वह सभी गैर-यहूदियों की आशा होगा.
१३
परमेश्वर, जो आशा के स्रोत हैं, तुम्हारे विश्वास करने में तुम्हें सारे आनंद और शांति से भर दें, कि तुम पवित्र आत्मा के सामर्थ्य के द्वारा आशा में बढ़ते जाओ.
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