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स्तोत्र ७३:१७-२२

पवित्रस्थान में निर्णायक मोड़

स्तोत्र ७३:१७-२२
१७
तब मैं परमेश्वर के पवित्र स्थान में जा पहुंचा; और वहां मुझ पर दुष्टों की नियति का प्रकाशन हुआ.
१८
सचमुच में, आपने दुष्टों को फिसलने वाली भूमि पर रखा है; विनाश होने के लिए आपने उन्हें निर्धारित कर रखा है.
१९
अचानक ही आ पड़ेगा उन पर विनाश, आतंक उन्हें एकाएक ही ले उड़ेगा!
२०
जब दुस्वप्न के कारण निद्रा से जागने पर एक व्यक्ति दुस्वप्न के रूप से घृणा करता है, हे प्रभु, उसी प्रकार आपके जागने पर उनके स्वरूप से आप घृणा करेंगे!
२१
जब मेरा हृदय खेदित था तथा मेरी आत्मा कड़वाहट से भर गई थी,
२२
उस समय मैं नासमझ और अज्ञानी ही था; आपके सामने मैं पशु समान था.
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