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स्तोत्र ७३:१३-१६

स्तोत्र ७३:१३-१६

१३
क्या लाभ हुआ मुझे अपने हृदय को शुद्ध रखने का? व्यर्थ ही मैंने अपने हाथ निर्दोष रखे.
१४
सारे दिन मैं यातनाएं सहता रहा, प्रति भोर मुझे दंड दिया जाता रहा.
१५
अब मेरा बोलना उन्हीं के जैसा होगा, तो यह आपकी प्रजा के साथ विश्वासघात होता.
१६
मैंने इस मर्म को समझने का प्रयास किया, तो यह अत्यंत कठिन लगा.
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