मुख्य सामग्री पर जाएँ
अय्योब १४:१३-१७

अस्थायी शरण और भविष्य की आशा की विनती

अय्योब १४:१३-१७
१३
“उत्तम तो यही होता कि आप मुझे अधोलोक में छिपा देते, आप मुझे अपने कोप के ठंडा होने तक छिपाए रहते! आप एक अवधि निश्चित करके इसके पूर्ण हो जाने पर मेरा स्मरण करते!
१४
क्या मनुष्य के लिए यह संभव है कि उसकी मृत्यु के बाद वह जीवित हो जाए? अपने जीवन के समस्त श्रमपूर्ण वर्षों में मैं यही प्रतीक्षा करता रह जाऊंगा. कब होगा वह नवोदय?
१५
आप आह्वान करो, तो मैं उत्तर दूंगा; आप अपने उस बनाए गये प्राणी की लालसा करेंगे.
१६
तब आप मेरे पैरों का लेख रखेंगे किंतु मेरे पापों का नहीं.
१७
मेरे अपराध को एक थैली में मोहरबन्द कर दिया जाएगा; आप मेरे पापों को ढांप देंगे.
Settings

Reading Style

Typeface

Font Size 19px

Reading Width 45 chars

Options