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विलापगीत ३:४३-५३

विलापगीत ३:४३-५३

४३
“आपने स्वयं को कोप में भरकर हमारा पीछा किया; निर्दयतापूर्वक हत्यायें की हैं.
४४
आपने स्वयं को एक मेघ में लपेट रखा है, कि कोई भी प्रार्थना इससे होकर आप तक न पहुंच सके.
४५
आपने हमें राष्ट्रों के मध्य कीट तथा कूड़ा बना छोड़ा है.
४६
“हमारे सभी शत्रु बेझिझक हमारे विरुद्ध निंदा के शब्द उच्चार रहे हैं.
४७
आतंक, जोखिम, विनाश तथा विध्वंस हम पर आ पड़े हैं.”
४८
मेरी प्रजा के इस विनाश के कारण मेरे नेत्रों के अश्रुप्रवाह नदी सदृश हो गए हैं.
४९
बिना किसी विश्रान्ति मेरा अश्रुपात होता रहेगा,
५०
जब तक स्वर्ग से याहवेह इस ओर दृष्टिपात न करेंगे.
५१
अपनी नगरी की समस्त पुत्रियों की नियति ने मेरे नेत्रों को पीड़ित कर रखा है.
५२
उन्होंने, जो अकारण ही मेरे शत्रु हो गए थे, पक्षी सदृश मेरा अहेर किया है.
५३
उन्होंने तो मुझे गड्ढे में झोंक मुझ पर पत्थर लुढ़का दिए हैं;
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