स्तोत्र ९०:७-९
७
आपका कोप हमें मिटा डालता है, आपकी अप्रसन्नता हमें घबरा देती है.
८
हमारे अपराध आपके सामने खुले हैं, आपकी उपस्थिति में हमारे गुप्त पाप प्रकट हो जाते हैं.
९
हमारे जीवन के दिन आपके क्रोध की छाया में ही व्यतीत होते हैं; हम कराहते हुए ही अपने वर्ष पूर्ण करते हैं.