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स्तोत्र ७३:६-७

स्तोत्र ७३:६-७

अहंकार उनके गले का हार है; तथा हिंसा उनका वस्त्र.
उनके संवेदन शून्य हृदय से अपराध ही निकलता है; उनके मस्तिष्क में घुमड़ती दुष्कल्पनाओं की कोई सीमा ही नहीं है.
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