स्तोत्र ९६:१०-१२
१०
राष्ट्रों के सामने यह घोषणा की जाए, “याहवेह ही शासक हैं.” यह एक सत्य है कि संसार दृढ़ रूप में स्थिर हो गया है, यह हिल ही नहीं सकता; वह खराई से राष्ट्रों का न्याय करेंगे.
११
स्वर्ग आनंदित हो और पृथ्वी मगन; समुद्र और उसमें मगन सब कुछ इसी हर्षोल्लास को प्रतिध्वनित करें.
१२
समस्त मैदान और उनमें चलते फिरते रहे सभी प्राणी उल्लसित हों; तब वन के समस्त वृक्ष आनंद में गुणगान करने लगेंगे.
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