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स्तोत्र ५२:२-४

स्तोत्र ५२:२-४

तेज उस्तरे जैसी तुम्हारी जीभ विनाश की बुरी युक्ति रचती रहती है, और तुम छल के कार्य में लिप्‍त रहते हो.
तुम्हें भलाई से ज्यादा अधर्म, और सत्य से अधिक झूठाचार पसंद है.
हे छली जीभ, तुझे तो हर एक बुरा शब्द प्रिय है!
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