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स्तोत्र १४४:३-४

स्तोत्र १४४:३-४

याहवेह, मनुष्य है ही क्या, जो आप उसकी ओर ध्यान दें? क्या है मनुष्य की सन्तति, कि आप उसकी हितचिंता करें?
मनुष्य श्वास समान है; उसकी आयु विलीन होती छाया-समान है.
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