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सूक्ति संग्रह ५:११-१४

सूक्ति संग्रह ५:११-१४

११
और जीवन के संध्याकाल में तुम कराहते रहो, जब तुम्हारी देह और स्वास्थ्य क्षीण होता जाए.
१२
और तब तुम यह विचार करके कहो, “क्यों मैं अनुशासन तोड़ता रहा! क्यों मैं ताड़ना से घृणा करता रहा!
१३
मैंने शिक्षकों के शिक्षा की अनसुनी की, मैंने शिक्षाओं पर ध्यान ही न दिया.
१४
आज मैं विनाश के कगार पर, सारी मण्डली के सामने, खड़ा हूं.”
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