स्तोत्र ५५:६-८
६
तब मैं विचार करने लगा, “कैसा होता यदि कबूतर समान मेरे पंख होते! और मैं उड़कर दूर शांति में विश्राम कर पाता.
७
हां, मैं उड़कर दूर चला जाता, और निर्जन प्रदेश में निवास बना लेता.
८
मैं बवंडर और आंधी से दूर, अपने आश्रय-स्थल को लौटने की शीघ्रता करता.”
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