Skip to content
स्तोत्र ३८:१७-१८

स्तोत्र ३८:१७-१८

१७
अब मुझे मेरा अंत निकट आता दिख रहा है, मेरी पीड़ा सतत मेरे सामने बनी रहती है.
१८
मैं अपना अपराध स्वीकार कर रहा हूं; मेरे पाप ने मुझे अत्यंत व्याकुल कर रखा है.
Settings

Reading style

Typeface

Font size 19px

Reading width 90 chars

Options