मत्तियाह १०:२४-२५
२४
“शिष्य अपने गुरु से श्रेष्ठ नहीं और न दास अपने स्वामी से.
२५
शिष्य को यही काफ़ी है कि वह अपने गुरु के तुल्य हो जाए तथा दास अपने स्वामी के. यदि उन्होंने परिवार के प्रधान को ही बेलज़बूल घोषित कर दिया तो उस परिवार के सदस्यों को क्या कुछ नहीं कहा जाएगा!