विलापगीत ३:२७-३०
२७
मनुष्य के लिए हितकर यही है कि वह आरंभ ही से अपना जूआ उठाए.
२८
वह एकाकी हो शांतिपूर्वक इसे स्वीकार कर ले, जब कभी यह उस पर आ पड़ता है.
२९
वह अपना मुख धूलि पर ही रहने दे— आशा कभी मृत नहीं होती.
३०
वह अपना गाल उसे प्रस्तुत कर दे, जो उस प्रहार के लिए तैयार है, वह समस्त अपमान स्वीकार कर ले.